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मैंने आ आ, उ, ऊ.... लिखना सन्त मेरीज के आंगन से प्रारम्भ किया| नई बस्ती में चारों तरफ बीहड़ सा मैदान और बीच में सन्त मेरीज विद्यालय| प्रारम्भ में चार कमरों से विद्यालय प्रारम्भ हुआ| प्रथम प्राचार्या, सिस्टर सलोगी के ओजपूर्ण व्यक्तित्व और सख्त प्रशासन से हम जैसे सैकड़ों बच्चे संस्कारित होकर अध्ययन के महत्व को महत्त्वपूर्ण समझने लगे| इस विद्यालय के कारण आस-पास बस्ती बसने लगी| फादर नॉर्बट मस्करेन्हस के निर्देशन में विद्यालय प्रगति के पथ पर चलने लगा| आज नई बस्ती की जमीन बहुत कीमती हो गयी है, निश्चय ही इस नगर में, इस बस्ती क॑ विकास में एवं अच्छे स्तर की शिक्षा देने का श्रेय सन्‍त मेरीज विद्यालय को है।




मैं बधाई देना चाहूँगा, सन्‌ 1984 में मऊरानीपुर के परगनाधिकारी श्री शिवशंकरसिंह को, जिन्होंने स्वयं रोमन कैथोलिक डायसीज ऑफ झाँसी के संचालक पूज्यनीय बिशप स्वामी से मुलाकात की, और क्षेत्र के लोगों की विद्यालय की माँग को रखा| श्री बिशप स्वामी जी के पास अन्य शहरों में विद्यालय स्थापित करने के प्रस्ताव थे। लेकिन उन्होंने मऊरानीपुर की माँग को स्वीकार किया| ये हम नगर वासियों का सौभाग्य था|

5 जुलाई 1985 को बिशप स्वामी जी ने मऊरानीपुर में विद्यालय निर्माण हेतु फादर नॉर्बट मस्करेन्हस कीनियुक्ति की| बहुत सी अड़चनों को पार करते हुये 18 जुलाई 1987 को विद्यालय का विधिवत्‌ उद्घाटन किया गया|

सन्त मेरीज विद्यालय का प्रथम एथलीटिक मीट व फिजिकल कल्चर समारोह सन्‌ 1988 में आयोजित किया गया| मेरे लिये यह सौभाग्य की बात है कि इस प्रथम व ऐतिहासिक समारोह में मैं भी प्रतिभागी था, उस समय के छाया चित्र आज भी बचपन की ओर ले जाते हैं और समारोह की भव्यता को दर्शाते हैं|

14 नवम्बर 1989 को मऊरानीपुर जेसीज द्वारा आयोजित बाल प्रतियोगिता में विजेता की शील्ड संत मेरीजविद्यालय को मिली, जो विद्यालय की संभवत: पहली विजेता शील्ड थी|

 

 




हम मोम की तरह कोमल बच्चे, 'बड़ी सिस्टर' सिस्टर सलोमी के सख्त प्रशासन से बहुत डरते थे। लेकिनसमय-समय पर उनका दुलार, अध्ययन में रुचि बढ़ाने की कला उनके पास थी | हर बच्चे का नाम, कक्षा में स्थिति की जानकारी उनके पास रहती थी | विद्यालय का दूसरा एथलीटिक मीट व फिजिकल कल्चर समारोह 24 नवम्बर 1990 शनिवार को, सिस्टर सलोमी के कुशल निर्देशन में सम्पन्न हुआ | दिनॉक 24 नवम्बर 1990 को तत्कालीन S.D.M. विद्यालय में पधारे और उनके द्वारा की टिप्पणी, “विद्यालय की गतिविधियाँ निश्चित रूप से प्रशंसनीय है| बच्चों के शैक्षिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक विकास के साथ-साथ नैतिक शिक्षा का भी समावेश वांछित है।”

महोदय जी के उत्साह ने विद्यालय विकास में संजीवनी की तरह काम किया|

मुझे अच्छी तरह याद है कि इसी वर्ष सिस्टर सलोमी ने हम बच्चों को सूचना “फादर नॉर्बट 11 अक्टूबर 1990 से संत मेरीज, बाँदा के प्राचार्य बन गये हैं, और निकट भविष्य में मऊरानीपुर से कार्य-मुक्त हो जायेंगे।” इस खबर ने हम बच्चों को व्याकुल कर दिया। आज मुझे एहसास होता है कि फादर नॉर्बट ने किन कठिनाइयों का सामना करते हुए एक महान विद्यालय की स्थापना की और ऐसी नीति-रीतियाँ अपनायी, जो आज भी कॉलेज के भविष्य में सहायक हैं।




अभी तक विद्यालय और बच्चे होम Examination में अपनी प्रतिभा दिखाते थे| सन्‌ 1991 में विद्यालय के 50 बच्चों का पहला बैच कक्षा-5 की पब्लिक बोर्ड परीक्षा की कसौटी पर कसा गया| परिणाम स्वरूप कु. कीर्तिमा शर्मा ने प्रथम स्थान प्राप्त किया और सभी छात्र-छात्रायें प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुये|

फादर मैथ्यू ने फादर नॉर्बट के बाद प्रबन्धक पद सन्‌ 1991 में संभाला व सन्‌ 1993 तक कॉलेज के विकास मेंमहत्वपूर्ण योगदान दिया| वे हम सभी बच्चों को पिकनिक टूर में बनारस ले गये व बच्चों को देशाटन के महत्व के बारे अवगत कराते रहे | इस प्रकार की यात्राओं से हम बच्चों को देश व दुनिया को करीब से जानने का मौका मिला|

छात्र जीवन में प्रत्येक विद्यार्थी का कोई आदर्श हुआ करता है| जब मैं कक्षा-5 का छात्र था, तब अक्सर श्रीअशोक निरंजन सर से कु0 पूनम अग्रवाल की स्मरण क्षमता की तारीफ सुना करता था। जो मुझसे एक क्लाससीनियर थीं| मेरा मन सदैव उनके सान्निध्य में रह कर उनसे कुछ सीखने को इच्छुक रहता था| तभी एक संयोग हुआ कि मेरा व पूनम दीदी का स्कूल वाहन एक ही हो गया| मैंने इस अवसर का उपयोग किया| चूंकि मेरे घर सेविद्यालय लगभग 1.5 कि.मी. हैं स्कूल पहुँचने में लगभग 10-12 मिनट तक का समय लग जाता था| इस अवसर का उपयोग मैं, पूनम दीदी के साथ किसी भी शैक्षिक विषय पर चर्चा करने में खर्च करता था। यह निश्चित ही मेरे छात्र जीवन की महत्त्वपूर्ण पूंजी रही| तभी से मैं उनकी कुशाग्र बुद्धि का कायल हो गया|




सन्‌ 1995 में क॒0 पूनम अग्रवाल ने हाईस्कूल परीक्षा में क्षेत्र में सर्वाधिक अंक प्राप्त किये| वे इस विद्यालय कीपहली छात्रा हैं जिन्होंने प्रथम प्रयास में M.B.B.S. परीक्षा उत्तीर्ण की |

सिस्टर सलोमी की विद्यालय से भावपूर्ण विदाई सन्‌ 1995 को हुयी| विद्यालय के साथ-साथ मऊरानीपुर क्षेत्र भीउनकी विदाई पर दुःखी था| मेरे दादा व दादी आज भी उनको याद कर लिया करते हैं।

जब मैं कक्षा-8 में था, तब सिस्टर विनीता विद्यालय की प्राचार्य बनकर आ चुकी थीं, उन्होंने शिक्षा पद्धति मेंमहत्त्वपूर्ण बदलाव किये| समय-समय पर हम बच्चों के टेस्ट लिये जाने लगे| बिना पूर्व सूचना के भी टेस्ट लेकरबच्चों की शैक्षिक व मानसिक स्तर का आकलन होता था |

उस समय श्री प्रमोद शर्मा सर अपने विषय के अतिरिक्त, सामान्य ज्ञान के विकास में हम बच्चों पर विशेष ध्यानदिया करते थे| उनके प्रयासों का परिणाम था कि अनेकों संस्थानों, यहां तक कि दिल्‍ली से आयोजित सामान्य ज्ञान प्रतियोगिताओं में हम बच्चों ने अनेक पुरस्कार जीते|




फादर मैथ्यू के बाद फादर मार्टिन ने प्रबन्धक का कार्यभार सन्‌ 1993 से 1995 तक संभाला। वे अत्यधिकसजग मैनेजर थे| वे पर्यावरण प्रेमी थे। उन्होंने हम छात्रों को पेड़ पौधे लगाने को प्रेरित किया। उन्होंने मंच परप्रभावपूर्ण उपस्थिति व्यक्त करने के गुड़ हम बच्चों को सिखाये|

उसी समय 9 सितम्बर 1994, शुक्रवार को शिक्षा उप निदेशक श्री अशोक कुमार उपाध्याय ने विद्यालय निरीक्षणके दौरान विद्यालय के विकास की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की|

फादर सूसै रतनम ने 5 वर्षों तक विद्यालय की रफ्तार को तेज किया| वे सन 1995 से जुलाई 2000 तकमैनेजर पद पर रहे | उनके समय में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान जोरदार वर्षा हुयी जिसके कारण न चाहतेहुये भी कार्यक्रम रद्द करना पड़ा| तभी फादर सूसे ने घोषणा की कि विद्यालय में विशाल हॉल बनवाया जायेगा|उन्होंने अपनी घोषणा को मूर्त रूप दिया और एक विशालकाय मल्टीपरपज हॉल का निर्माण कराया जो उनकी वास्तुकला प्रेम का प्रतीक है | यह हॉल न जाने कितने ही सांस्कृतिक कार्यक्रमों का गवाह बन चुका है | चाहे वह बाल दिवस हो, शिक्षक दिवस हो, गणतंत्र दिवस हो, सांस्कृतिक कार्यक्रम हो या कोई सेमिनार हो यह हॉल अपनी उपयोगिता साबित करता रहा है |




सन 1999 में विद्यालय को हाईस्कूल विज्ञान वर्ग की मान्यता मिल गयी थी परन्तु मेरी किस्मत में केवलकक्षा-8 तक ही विद्यालय का अध्ययन सुख लिखा था। मुझे हाईस्कूल, इंटरमीडिएट, B.Sc., M.Sc. अन्यत्रसंस्थाओं से करनी पड़ी| तब कहीं मुझे विद्यालय के संस्कार, अनुशासन आदि का आभास व गर्व हुआ|

बाल्यकाल में सन्त मेरीज विद्यालय छोड़ने का अत्यन्त खेद था| पर मेरा मन शायद यहीं रह गया था। औरविधाता को भी यही मंजूर था कि जो संस्कार, नीति-रीति व शिक्षा मैंने इस विद्यालय से प्राप्त किये वह आने वाली पीढ़ी तक पहुँचाऊं|

जब विद्यालय में मैंने अपनी दूसरी पारी की शुरुआत एक शिक्षक के रूप में की तो कुछ नहीं बदला था, वही अनुशासन, वही शिक्षकों का उत्साही स्वभाव, वही छात्रों में प्रतिस्पर्धा की भावना|

हाँ, कुछ बदला था तो विद्यालय का आकार, प्रारंभ में 4 कमरों का स्कूल आज चालीस कमरों के साथइण्टरमीडिएट स्कूल हो चुका था। यातायात व्यवस्था सुदृढ़ हो चुकी थी। तीन बसों के प्रबन्ध से आस-पास के क्षेत्रों के छात्रों को सुविधा हो चुकी थी| जो पौधे हम छात्रों ने लगाये थे, आज वे विशाल वृक्षों का रूप ले चुके थे|




एक शिक्षक के रूप में मुझे प्रधानाचार्य सि० विनीता व मैनेजर पद पर फादर पीटर सिल्वेस्टर का  सान्निध्य प्राप्त हुआ। सिस्टर विनीता व फादर पीटर सिल्वेस्टर ने बच्चों के सर्वांगीण विकास, विशेष कर नेतृत्व क्षमता को प्रोत्साहित करने व जन्मजात गुणों की परख के लिए एक अनूठा व सकल प्रयोग किया| उन्होंने समस्तछात्र-छात्राओं को चार दलों में बाँट दिया| चाहे वह क्विज, कव्वाली, नृत्य, एकांकी, चित्रकला, भाषण प्रतियोगिता, परेड हो बच्चों के मध्य प्रतिस्पर्धा देखते ही बनती है।

कुछ समय पहले की ही एक रोचक घटना बाद आती है। परीक्षा सत्र के बाद सभी अध्यापक अध्यापिकाएँ इकठठे बैठे थे| सभी कुछ न कुछ करने में व्यस्त थे तभी मैंने श्रीमती रूचिरा तिवारी मैडम से कहा “मैडम आप के पास हिन्दी साहित्य की किताब है?” शायद मैडम मेरी बात सुन नहीं पायी थी। मैंने, मैडम से फिर यही बात दुहरायी, “मैडम आपके पास हिन्दी साहित्य की किताब है?” रूचिरा मैडम ने सौम्यतापूर्वक कहा, “बेटे! मेरेपास यह किताब नहीं है|”




पास बैठी अध्यापिकाओं को “बेटे” शब्द सुनकर हँसी आ गयी। मैं कुछ कह पाता इससे पहले स्वयं रूचिरामैडम ने स्पष्टीकरण दिया कि, “विक्रम मेरे बेटे जैसा है, विद्यार्थी दिनों में यह पढ़ने में अग्रणी होने के साथ-साथ नटखट भी हुआ करता था। जो शिक्षा व संस्कार हम शिक्षकों ने विक्रम को दिये आज यह स्वयं शिक्षक बन उन संस्कारों को छात्रों में बॉँट रहा है।”

मैडम के उन शब्दों को सुनकर मैंने अपने आप को गौरवान्वित महसूस किया व मुस्कुरा कर आगे चल दिया|

19 नवम्बर सन्‌ 1988 को सि० सलोमी द्वारा दिया गया वक्तव्य, “शैक्षिक स्तर पर एक अनोखा अनुभव हमारा है| कई बच्चे पिछड़ी जाति के हैं, तो कई बच्चे हरिजन भी हैं| उनमें से कई कक्षा में प्रथम भी आते हैं| अतः पिछड़ी जाति के तथा हरिजन बच्चों को आगे बढ़ाने में हम विशेष परिश्रम करेंगे।“

इस वक्तव्य को वर्तमान फादर पीटर सिल्वेस्टर ने जीवंत बनाया है। विद्यालय के माहौल को देखकर लगता है कि गुरु वशिष्ठ का आश्रम है जहाँ स्वयं श्री राम पढ़ने गये थे या गुरु संदीपनि का उज्जयनी स्थित आश्रम जहां भगवान श्रीकृष्ण और गरीब सुदामा बगैर किसी वर्ग भेदभाव के समान रूप से विद्या अध्ययन करते थे।




फादर पीटर सिस्टर ने कम्यूटीकृत शिक्षा को विशेष प्रोत्साहन दिया है। उनमें छात्रों के बौद्धिक स्तर को परखने की अजब क्षमता है। उनकी संगीत रुचि से भी छात्र, शिक्षक व समाज परिचित है। विद्यालय में शिक्षा को उच्च श्रेणी तक पहुंचाने का श्रेय फादर सिल्वेस्टर को ही है। राधिका कठिल का प्रदेश मेरिट सूची में स्थान आना फादर के कुशल निर्देशन का ही फल है।

2004 में विद्यालय में वार्षिकोत्सव का आयोजन किया गया। जिसकी तैयारियों में काफी श्रम किया गया। आयोजन में आयी अपार भीड़ सन्त मरीज विद्यालय की लोकप्रियता की सूचक थी।




सभी आगन्तुकों ने खुले हृदय से कार्यक्रम की प्रशंसा की। कार्यक्रम की खासियत यह था कि LKG से लेकर 12 कक्षा तक के सभी छात्र छात्राओं ने उत्साह से भाग लिये। कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए हर स्तर से प्रयास किये गये। कुछ पोशाकें तो बाहर क्षेत्र से मंगवाई गयीं। लगभग सभी दैनिक समाचार-पत्रों ने समारोह की प्रशंसा की। कार्यक्रम के अन्त में फादर पीटर सिल्वेस्टर ने विद्यालय के उन्नत भविष्य योजनाओं का वर्णन किया।




सन 2004 को सि० रेनेटा ने प्रधानाचार्य पद माला। वे एक अनुभवी व सौम्य प्रधानाचार्य है। उनके सानिध्य में विद्यालय परिवार सर्वोच्च लक्ष्य की प्राप्ति हेतु प्रयासरत है।

मैं आज विद्यार्थी से इसी विद्यालय में गणित का व्याख्याता हूँ। मैं बड़ा सौभाग्यशाली हूँ जहाँ से ज्ञान अर्जित किया माँ वीणा के उसी आंगन में अपने ज्ञान को फैलाने का सौभाग्य मिला। मैं एक बेतुके पत्थर की तरह था, जिन शिल्पकारों ने जो आकार दिया, मैं उन सभी श्रीचरणों में पुष्पार्पण करता हूँ। मैं अध्यनरत बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की कामना करो हुये, एक संदेश देना चाहता हूँ -

"शिखर की राह में कमियों पर नजर जरूरी है। चाहत की छाया, तारीफों के पुल, हमें कमजोर कर दें।“ 

 

स्रोत: विक्रम रूसिया द्वारा लिखी यह कहानी सर्वप्रथम, संत मेरीज इंटर कॉलेज मऊरानीपुर की पत्रिका "अभ्युदय" में प्रकाशित की गयी थी|




Vikram Rusia
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