Loading

यह कहानी सॉफ्टवेयर उद्योग में काम करने वाले अधिकतर व्यक्तियों के विदेश यात्रा के सपने के पीछे की वास्तविकता को उजागर करती है। ऐसी बातें हैं जिनके बारे में कोई बात नहीं करता है। समस्याएं जो एक नए देश की यात्रा करने और वहां रहने के दौरान भी उत्पन्न होती हैं।

मैं सुबह-सुबह अपने कार्यालय पहुँच कर, जब अपने desk की तरफ जा रहा था तो देखा कि पहले एक लड़का “अमित”, जो मेरे साथ पहले काम करता था, वो अपने मैनेजेर के कार्यालय के सामने सोफे पर बैठा था। जहाँ तक मुझे याद था उसने एक वर्ष पूर्व ही नौकरी करना शुरू किया था। मैंने देखा उसके चेहरे पर एक अजीब सी खुशी थी, मैं उसके पास गया और उसकी खुशी के पीछे का कारण पूछा "उसने जवाब दिया," मेरे प्रोजेक्ट में on-site का अवसर है और मेरे मैनेजर ने मुझे इसी विषय में बात करने के लिए बुलाया है। " उसके चेहरे पर मुस्कराहट थी और मैंने उसकी तरफ देखा और अपनी पहली ऑन-साइट की यात्रा मुझे याद आ गयी और साथ में मेरे चेहरे पर एक मुस्कान भी आ गई और उस लड़के ने पूछा, "क्या बात है?"

मैंने कहा, “मुझे अपने पहली on-site की यात्रा याद आ गयी। मैं आपको अपने ऑन-साइट अनुभव बताता हूं, तुम थोड़ा संभल के निर्णय लेना।"

अपनी इंजीनियरिंग की पढाई पूरी होने के बाद, मैं आईटी में नौकरी पाने के लिए दिल्ली आया। बहुत प्रयासों के बाद, मुझे दिल्ली में एक छोटी सॉफ्टवेयर कंपनी में नौकरी मिल गई। हालांकि, मेरा वेतन बहुत कम था लेकिन मुझे विभिन्न प्रौद्योगिकी में सॉफ्टवेयर विकास में काम करने का अच्छा मौका मिला। बहुत कम समय में, मैंने कई चीजें सीखीं। मुझे तब तक on-site ऑन-साइट अवधारणा के बारे में नहीं पता था, जब तक कि मेरे चचेरे भाई, जिन्हें सॉफ्टवेर उद्योग में अच्छा अनुभव था, ने मुझे on-site के बारे में बताया की इसमें कंपनी आपको काम करने के लिए विदेश भेजती है। उन्होंने मुझे अच्छे ऑन-साइट अवसरों की तलाश करने का सुझाव दिया।

अब, इस बारे में जानने के बाद, मैंने अपने मैनेजर से ऑनसाइट अवसरों के लिए कहा और नियमित अंतराल पर अगले कुछ महीनों तक इस बारे में पूछता रहा। कुछ महीनों बाद उन्होंने मुझे बुलाया और मुझे बताया कि मेरे लिए एक ओन-साइट का अवसर है और मुझसे पूछा कि क्या मैं अभी भी इसके लिए इच्छुक हूं। जैसे ही मैंने उनकी बातें सुनीं, मुझे लगा जैसे मैंने अपना सपना हासिल कर लिया है। मैंने उन्हें सकारात्मक प्रतिक्रिया के साथ धन्यवाद दिया और उन्होंने बताया कि मुझे अगले दो दिनों में और विवरण मिलेगा।

मैं अपनी डेस्क पर लौट आया और अपने एक सहयोगी को इस बारे में बताया। उन्होंने मुझे बधाई दी और मुझसे पूछा कि मेरा पासपोर्ट तैयार है या नहीं। उस समय मेरे पास पासपोर्ट नहीं था और मुझे डर हुआ कि पासपोर्ट न होने के कारण मैं यह अवसर खो सकता हूं। तुरंत, मैंने तत्काल पासपोर्ट आवेदन प्रक्रिया के बारे में खोज शुरू कर दी थी। अगले दिन सुबह तक मैं परेशान था। जब मैं ऑफिस आया, मैंने अपने मैनेजर को दफ्तर के चैट-बॉक्स पर  सन्देश भेजा और उससे कहा कि मेरे पास पासपोर्ट नहीं है, लेकिन मैं इसे जल्द से जल्द प्राप्त करूंगा। मुझे 15 मिनट के बाद उनका जवाब मिला, "आपको पासपोर्ट के लिए आवेदन करने की आवश्यकता नहीं है।"  यह पढ़कर मैं दुखी हो गया और पूछा कि क्या मैंने यह अवसर गंवा दिया है।  इस पर उनका जवाब पढ़कर मैं थोड़ी देर के लिए समझ नहीं पाया कि खुश होऊं या दुखी?




उन्होंने जवाब दिया, "क्या आपके पास वोटर-आईडी कार्ड है? नेपाल जाने के लिए आपको पासपोर्ट की आवश्यकता नहीं होगी, बस अपनी वोटर-आईडी तैयार रखें।” जहाँ लोग ऑन-साइट के लिए पासपोर्ट के लिए आवेदन करते हैं, मैंने अपने मतदाता कार्ड के लिए आवेदन किया। सच में मेरे दोस्त मुझ पर हंस रहे थे। हालाँकि, मैं इस अवसर के लिए बहुत उत्साहित था। दिल्ली से काठमांडू, नेपाल पहुंचने में केवल 40 मिनट लगे। उन्होंने मुझे रहने के लिए एक अपार्टमेंट में एक फ्लैट दिया। वहाँ के माहोल में समायोजित होना थोड़ा मुश्किल था। वहां का भोजन जैसे सूखा आलू, सूखा पोहा आदि को खाना कठिन था। थोड़ा समय लगा लेकिन  मैंने अपने रसोइए को भारतीय व्यंजन बनाना सिखा दिया। इस तरह से वहां मैंने अपनी खाने की समस्या दूर की ।

मेरा काम एक संगठन के कागजी काम को डिजिटल बनाना था। परियोजना इतनी ख़राब थी कि मुझे एक कागज़ की फोटो खींच कर कंप्यूटर में डालनी होती थी। केवल मैं जानता हूं कि मैं कैसे मैंने ये किया। इसके विपरीत, मैं अपने मुख्य तकनीकी कौशल और कार्य से दूर हो गया। अपने पक्षकार प्रबंधक (क्लाइंट मैनेजर) को खुश रखने के लिए, मैं उसे हर हफ्ते डिनर पार्टियों के लिए ले जाता था। जल्द ही, मुझे एहसास हुआ कि अगर मैं लंबे समय तक वहां रहूंगा तो निश्चित रूप से अपने तकनीकी कौशल पर पकड़ खो दूंगा। मैंने जल्द से जल्द लौटने का मन बनाया। एक दिन मेरे क्लाइंट मैनेजर और मेरे बीच बहस हुई और उसने गुस्से में मेरे ऑफिस का लैपटॉप उठाकर फर्श पर फेंक दिया। उस दिन मैंने नेपाल से तुरंत वापस जाने का फैसला किया लेकिन मेरे चचेरे भाई ने मुझे रोका और तब तक रुकने की सलाह दी, जब तक कि मेरी कंपनी मुझे वापस नहीं बुला लेती। मैंने वहां दो महीने काम किया और फिर मेरी कंपनी ने मुझे वापस आने के लिए कहा। मेरी पहली यात्रा से मैंने बहुत कुछ सीखा लेकिन काफी कुछ गवां भी दिया।"

"वाह! नेपाल भी एक on-site पर  जाते है।” अपने हंसते हुए कहा।

"यहाँ पर on-site के लिए मेरे उन्माद का अंत नहीं था"। मैंने उत्तर दिया।

नेपाल के बाद, मेरे बॉस ने मुझे युगांडा जाने के लिए कहा और मैं सोच रहा था कि वहाँ कौन जाता है? इसलिए, मैंने कंपनी बदलने का फैसला किया। मेरे कॉलेज के एक परिचित ने मुझे NY Finance पुणे में नौकरी पाने में मदद की और मैं पुणे आ गया। दो साल तक इसी अच्छा काम करने के बाद भी मुझे इस कंपनी में विदेश यात्रा के लिए कोई अवसर प्राप्त नहीं हुआ। उसी समय मेरे कॉलेज का एक दोस्त जो एक दूसरी सॉफ़्टवेयर कंपनी में काम कर रहा था, उसे उसकी कंपनी से कई सारे विदेश यात्रा के अवसर मिल रहे थे। मैं उसकी नौकरी से बहुत प्रभावित था इसलिए मैंने उससे बात करने का फैसला किया। मैंने उसे फोन किया और मुझे पता चला की वो छह महीने के लिए ब्राजील जा रहा था। मैंने उसे मेरे लिए उसकी कंपनी में बात करने के लिए कहा।

एक महीने के भीतर मुझे उसकी कंपनी से फ़ोन आया और साक्षात्कार की प्रक्रिया शुरू हुई। उनकी चयन प्रक्रिया में एक HR और दो तकनीकी साक्षात्कार थे और इस सब में दो सप्ताह का समय लगा। इसी बीच, NY Finance से मेरे लिए एक महीने के लिए न्यूयॉर्क, अमेरिका की व्यावसायिक यात्रा करने के लिए अवसर आया। मैंने उन्हें अवधि को छह महीने तक बढ़ाने के लिए कहा जो उनके लिए बिल्कुल भी संभव नहीं था। अब निर्णय मुझ पर था और मैं नई कंपनी के प्रस्ताव पत्र की प्रतीक्षा कर रहा था, जो मुझे बिना देरी के मुझे मिल भी गया। लंबे समय तक ऑन-साइट अवसरों की सभी आशाओं के साथ मैंने नई कंपनी में शामिल होने का फैसला किया और NY फाइनेंस पुणे से इस्तीफा दे दिया। चूंकि मैं अपने काम में अच्छा इसलिए जब मैंने इस्तीफा दिया तो NY Finance के मेरे प्रबंधक ने मुझे रोकने की कोशिश की और अमेरिका यात्रा की अवधि दो महीने तक बढ़ा दी। हालांकि, मैं वहां नहीं रुका और नई कंपनी में चला गया हो गया।




यहां मुझे अच्छा काम मिला और कार्य-संस्कृति भी बहुत अच्छी थी।  मेरी आशा अनुसार कुछ समय पश्चात मुझे ऑन-साइट जाने का अवसर प्राप्त हुआ।  जगह का नाम जानने के बाद मुझे बहुत खुशी हुई। इस बार मुझे लैटिन अमेरिका जाना था। मैंने इसमें “लैटिन” के बारे में ज्यादा नहीं सोचा और "अमेरिका" पर गौर कर ख़ुशी मनाई। मुझे लैटिन अमेरिका के  देश डोमिनिकन रिपब्लिक जाना था। यह शुरू में दो महीने फिर और आगे चार महीने तक अवधि बढाने का प्रस्ताव था।

मैं इस व्यवसाय यात्रा के लिए बहुत उत्साहित था। भारत से डोमिनिकन रिपब्लिक की यात्रा करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था। मैंने अपने आप से पुणे से डोमिनिकन रिपब्लिक की यात्रा की योजना तैयार की, क्योंकि इससे पहले मेरे संपर्क में किसी को भी डोमिनिकन रिपब्लिक जाने अनुभव नहीं था। चिकित्सा, वीजा आदि जैसी सभी औपचारिकताओं के साथ, मैं जाने के लिए तैयार हो गया। मैं पहले पुणे से मुंबई गया और फिर दुबई के लिए उड़ान भरी।  दुबई पहुँचने के 6 घंटे बाद मुझे लन्दन के लिए उड़ान भरनी थी। लन्दन विमानतल पर भी मुझे अगली विमान यात्रा के लिए आठ घंटे इंतज़ार करना था। डोमिनिकन रिपब्लिक देश में मुझे पुन्टा काना शहर के लिए मैंने लंदन से विमान यात्रा की और मैं शाम 4 बजे के करीब पुन्टा काना पहुंचा। शुद्ध शाकाहारी होने के कारण, यात्रा के दौरान मुझे भोजन की बहुत समस्या हुई।

इस बार मेरा ठहराव सैंटो डोमिंगो के एक होटल में था जो कि पुंटा काना हवाई अड्डे से 180 किलोमीटर दूर था। मुझे पुन्टा काना विमानतल से सैंटो डोमिंगो टैक्सी से जाना था। वहां लोग इन टैक्सी को पिंक टैक्सी कहते थे क्योंकि लम्बे कद के काले रंग के पुरुष, गुलाबी रंग के कपड़े पहन कर टैक्सी चलाते थे। भाषा में विभिन्नता के कारण, टैक्सी चालकों से संवाद करना मुश्किल था, लेकिन किसी तरह मैंने उनको अपने विश्रामालय का पता समझाया। मैंने शाम को लगभग 4.30 बजे यात्रा शुरू की और अनुमान था की लगभग रात को 8 बजे तक मैं पहुँच जाऊंगा। 32 घंटे की विमान यात्रा के बाद, मैं इतना थक गया था कि मुझे पता ही नहीं चला कि मैं कब टैक्सी में सो गया। जब मैं उठा, तो मेरी घड़ी में 9:15 बज रहे थे और अभी भी मैं रास्ते में ही था। मैंने चालक से किसी तरह पूछा की अभी तक क्यूँ नहीं पहुँचे, लेकिन उसको भी पता नहीं था। शायद हम रास्ता भटक चुके थे। मैंने उसे रुकने के लिए कहा क्योंकि हम नहीं थे कि हम कहाँ जा रहे हैं।

अंधेरे आकाश के नीचे और अपने देश से 14000 किलोमीटर दूर, मैं बिना किसी नेटवर्क और इंटरनेट के एक सुनसान पुल पर पिंक टैक्सी के साथ खो गया था। मैं अनिश्चितता के डर से कांप रहा था और पता नहीं था कि आगे क्या करना है। हम वहां 10 मिनट खड़े रहे और चालक से बात करने की कोशिश की लेकिन उसे भी कुछ समझ नहीं आ रहा था। मुझे बस यही लग रहा था की मैं कहाँ फंस गया हूँ और समझ नहीं आ रहा था क्या करूँ? बस मन भगवन से प्रार्थना कर रहा था। इस बीच,  मोटर साईकिल पर सवार एक व्यक्ति वहाँ से गुजरा, जिसने हमें गंतव्य तक ले जाने में मदद की।

बना-बनाया भारतीय भोजन साथ ले से मुझे बहुत सहारा रहा क्योंकि मेरे लिए एक समय के लिए भी वहाँ का भोजन करना बहुत मुश्किल था। हां, मैं कुछ अधिक पैसे अवश्य कमा रहा था, लेकिन मुझे नहीं लगता कि पैसा ही एकमात्र ऐसी चीज है जो आपको नौकरी से संतुष्टि देती है। मेरे लिए काम भी उतना ही महत्वपूर्ण है। मैं वहां ज्यादा नहीं सीख रहा था। मैं इस बात से इनकार नहीं करूंगा कि क्लाइंट के साथ सीधे काम करना एक अच्छा अनुभव मुझे मिला लेकिन एक सप्ताह में यह सामान्य हो गया। एक महीने के भीतर मैं समझ गया कि वहां रहने से मुझे केवल पैसे ही मिलेंगे और कुछ नहीं।

इस एक महीने में मेरे दोस्तों और रिश्तेदारों ने मुझसे संपर्क किया और मुझे कहा कि मैं कितना भाग्यशाली हूँ, जो मुझे इतने दूर विदेश यात्रा का अवसर मिला। कुछ मुझसे पूछ रहे थे कि मुझे यह अवसर कैसे मिला और उनमें से कुछ ने मुझे इस तथाकथित उपलब्धि के लिए बधाई दी। मेरे जीवन की वास्तविक तस्वीर थी, सुबह जल्दी उठना और नाश्ता की तैयारी करना, कार्यालय के लिए तैयार होना और दोपहर के भोजन के लिए तैयार करना था। ऑफिस के बाद फिर से रात के खाने की तैयारी करना, घर पर बात कर, सो जाना और वापिस यही दोहराना। किसी तरह, मैंने अपना काम पूरा किया और उसी रास्ते से वापस भारत आया।  ओन-साइट की मेरी आधी इच्छाएं यहीं ख़त्म हो गई थी।




लेकिन यह अभी खत्म नहीं हुआ था, मुझे एक साल बाद फिर से विदेश जाने मौका मिला और उन्होंने मुझे ब्राजील भेजा। चूंकि ब्राजील का अच्छा नाम और प्रसिद्धि थी, इसलिए मैंने वहां जाने का फैसला किया। मैंने लगातार 16 घंटे की यात्रा की। मैं वहां पहुंचा और मुख्य समस्या फिर से भाषा की थी। कोई भी नहीं था जिसके साथ मैं बात कर सकता था, भाषा बाधा थी। कभी-कभी मेरे पास अनुवादक होता था, कभी-कभी नहीं। फिर, भोजन भी एक मुद्दा था, मैं बना-बनाया भारतीय व्यंजन पर जी रहा था। कुछ समय पश्चात् मैं कुछ दफ्तर में आये नए भारतीय सहयोगियों के साथ एक फ्लैट में रहने लगा। अब, खाना पकाने के अलावा, कुछ और दैनिक कार्य जैसे कि बर्तन धोना, सफाई करना मेरी दिनचर्या में शामिल हो गया। विदेश में भारत की तरह खाना और सफाई कार्य के लिए किसी को रखना थोड़ा मुश्किल और महँगा होता है। अतः यह काम खुद से करना होता है।

एक बार, मैंने और मेरे मित्रों ने ब्राजील घूमने के लिए निकले। 3 घंटे बिताने के बाद हम अपने गंतव्य तक पहुंचे, जो कि हमारे आवास से बहुत दूर नहीं था और यह सब भाषा के कारण उत्पन्न उलझन के कारण हुआ। हमारे कार्यालय के सहयोगियों ने हमें रात में शहर में बाहर न निकलने का सुझाव दिया और मुझे यह भी एहसास हुआ कि ब्राजील एक सुरक्षित देश नहीं है।  रात को आठ बजे के बाद सड़क पर कोई नहीं निकलता है।

यहाँ पर भी मुझे ज्यादा और अच्छा काम नहीं था, हालांकि मेरी कंपनी मुझे दो और वर्षों तक वहां रखना चाहती थी। मैंने हाथ जोड़कर विनम्रता से इनकार किया। मैं अपना वर्तमान कार्यकाल पूरा करने के बाद भारत वापस आ गया।

“मैं दूसरों के बारे में क्या कह सकता हूँ! मैं खुद भी ऑन-साइट के विचार से बहुत रोमांचित था।  लेकिन इन कठोर वास्तविकताओं के बारे में कौन जानता था।“ अमित ने कहा।

"मैंने इसके पीछे की परेशानियां देखी हैं। आपको बहुत पैसा मिलता है लेकिन अंत में आप उस पैसे को क्यों कमाते हैं?  अच्छा भोजन, सुकून की नींद, थोड़ा आराम और अपनों के साथ जीवन का आनंद लेने के लिए, लेकिन मुझे उसमें से कुछ भी नहीं मिल रहा था। भारत में हम इसे IT कंपनी में काम करने वाले हर एक व्यक्ति की उपलब्धि से इसे  जोड़ते हैं। हम हमेशा अपने दोस्तों और रिश्तेदारों द्वारा अंतर्राष्ट्रीय व्यापार यात्रा पर जाने की जानकारी सोशल मीडिय जैसे facebook इत्यादि पर देखकर मोहित हो जाते हैं लेकिन इसकी वास्तविकता में अंतर हो सकता है। उनमें से बहुत से लोग जाना नहीं चाहते हैं, लेकिन वे सिर्फ अपनी जरूरतों के कारण यात्रा करते हैं जैसे कि ऋण आदि का भुगतान करना।

मेरे कुछ दोस्त यूरोप, कनाडा की तरह अच्छे स्थानों पर काम कर रहे हैं, लेकिन उन्हें कई चीजों के साथ समझौता करना पड़ता है। आपको कुछ खरीदने के लिए दो बार सोचना पड़ सकता है और घर के दैनिक कार्यों में मदद करने के लिए किसी को रखना भारत के जैसा आसान और सस्ता नहीं है। कई लोगों के बच्चों का पालन विदेश में होने से बच्चों को अपनी ही मात्र-भाषा ठीक से नहीं आती। परिवार के और लोग जिन्हें विदेशी भाषा नहीं आती, बच्चों से बात करने में वाधा तो आती होगी। कई मित्र वर्षों से घर नहीं आये हैं, उनके माता-पिता को अपने बच्चों एवं नाती-पोतों से मिलने के लिए वर्षों तक इंतज़ार करना पड़ता है। इस सब ले बाद भी माता-पिता शायद खुश रहते हैं, क्यूंकि उनको यह कहने में अच्छा लगता है कि उनके बच्चे विदेश में नौकरी कर रहे हैं।

on-site जाने के लिए आपको जो बात ध्यान में रखनी है, वह है अच्छी जगह, अच्छे काम को अच्छी अवधि के लिए चुनना, तभी यह फायदेमंद होगा। अगर किसी ने मुझे इस सब के बारे में चेतावनी दी होती, तो शायद में बेहतर निर्णय लेता। मैं कहूंगा कि ओन-साइट जाना अच्छा है लेकिन हमेशा उतना अच्छा नहीं है जितना लोग सोचते हैं। कभी-कभी भारत में काम करना बेहतर हो सकता है अच्छा वेतन, अच्छा कार्य और एक आरामदायक और अच्छी जीवन शैली।”

अमित ने कहा, “ज़रूर!  मैं इन बातों को ध्यान में रखकर निर्णय लूँगा। आपकी सलाह के लिए धन्यवाद।"

इसके पश्चात् मैं उठ कर वापस अपनी मेज पर आ गया।

Kushal Rusia
Follow him:
Latest posts by Kushal Rusia (see all)

Facebook Comments

Top
error: Content is protected !!
%d bloggers like this: