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आत्मविश्वास और मेहनत से आप हमेशा सफलता अर्जित करेंगे ।

-विराट कोहली

मेरे पास एक कहानी है जो इस कथन के लिए एक आदर्श उदाहरण है । एक ऐसे शख्स की कहानी जिसने कुछ हासिल करने के लिए सिर्फ और सिर्फ कड़ी मेहनत की। वह शिक्षित नहीं था लेकिन उसने अपने बेहतर कल के लिए अपना रास्ता खुद बनाया।

सन 2011, बात तब की है जब मैं इंजीनियरिंग के दूसरे वर्ष में था और अपने मित्र नीलेश के साथ सिटी सेंटर, ग्वालियर में रहता था। हम लोग अक्सर ही पंडित जी की जूस की दुकान पर जाते रहते थे। एक दिन हमने वहां पर दो जूस लिए लेकिन हमें उन्होंने दो जूस के मूल्य से अधिक राशि बताई। पूछे जाने पर उन्होंने बताया की यह अतिरिक्त राशि, आधे घंट अधिक देर बैठने के लिए है।

जब मैंने पंडित जी से इस बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, “हमारे क्षेत्र में मेरी दुकान ही एकमात्र ऐसी जगह है जहां लोग ग्वालियर के इस भीषण गर्मी में भी दोपहर के समय घंटों बैठ सकते हैं और हमने देखा कि कुछ लड़के-लड़कियों ने यहां नियमित रूप से आना शुरू किया है। वो एक या दो जूस लेते हैं और 2-3 घंटे के लिए बैठे रहते हैं। जैसा कि आप देख सकते है इस दुकान में जगह कम है इसलिए दूसरे ग्राहक लौट जाते हैं। इसलिए, मैंने अपनी दुकान पर ऐसा नियम लागू किया।

मैंने गुस्से में जवाब दिया, ' लेकिन पंडित जी हमें इस बात की जानकारी नहीं थी और यह दुकान में भी कहीं नहीं लिखा है। इसके अतिरिक्त जब हम आये तब भी दुकान से किसी ने भी हमें इसके बारे में नहीं बताया। क्या आपको नहीं लगता, आपको यहां पर एक पटल पर लिख कर रखना चाहिए। यह पैसा कमाने का गलत तरीका है।

पंडित जी मुस्कराए और बोले, 'बेटा, एसी बात नहीं है मैंने ये गलत तरीके से पैसे कमाने का सोच कर नहीं किया है। मैं ग्वालियर में बहुत छोटी सी जगह से आया था तब जब मेरे पास कुछ भी नहीं था और आज जितना पास है वो पर्याप्त है। मैं अपने ग्राहकों को बेवकूफ बनाकर पैसे कमाने लिए ऐसा नहीं कर रहा हूं। मैंने धीरे-धीरे चीजें सीखकर इस छोटी सी दुकान का निर्माण करते हैं । आज भी मैं तुमसे कुछ सीखा है। मैं इस पर अमल करूंगा।“

यह सुनते ही मेरा गुस्सा खत्म हो गया । मैंने लगा कि पंडित जी का जीवन अवश्य ही संघर्ष पूर्ण रहा होगा और मुझे उनसे उनकी कहानी जाननी चाहिए। मैंने बिना देर किये उनसे उनकी कहानी सुनाने को अनुरोध किया।

पंडित जी हंसे और बोले, 'अवश्य सुनाऊंगा, लेकिन कभी आप अच्छे से समय लेकर आइये'।

मैंने कहा, 'मैं कहानियां सुनने के लिए हमेशा उपलब्ध रहता हूं।‘ तत्पश्चात उन्होंने मुझे अपनी कहानी सुनाई।




जून महीने की भीषण गर्मी में जब सूरज शीर्ष पर था, एक 19 साल का लड़का सड़क के किनारे अपने ठेले पर गन्ने का रस निकाल रहा था। उसके चेहरे का पसीना बाता रहा था कि वह घंटों काम कर रहा है। किसने सोचा होगा, वह ऐसा सिर्फ अपनी जीविका के लिए नहीं कर रहा था, वह गर्मियों की चिलचिलाती धूप में खुद को जला रहा था क्योंकि उसने सपने देखने की हिम्मत की थी। किसने सोचा होगा की, सड़क पर गन्ने का रस बेचकर कोई अपने बेहतर भविष्य के लिए रास्ता बना रहा था।

जब पंडित जी की उम्र करीब 14 साल की थी उनके एक चाचा उनकी शिक्षा रुकवाकर उन्हें काम के लिए गांव से ग्वालियर ले आये। पंडित जी के चाचा ग्वालियर के एक कारखाने में पर्यवेक्षक (सुपरवाइजर) थे और उन्होंने पंडित जी को कारखाने में एक मजदूर के तौर पर नौकरी दिलवा दी। उस समय पंडित जी को पता नहीं था कि यह उनके लिए सही रास्ता है या नहीं। उन्होंने वहां 6 महीने तक काम किया और उन्हें एहसास हुआ कि यह उनके लिए गलत जगह है। हालांकि, वह अपने चाचा के दबाव में थे इसलिए कोई फैसला नहीं ले सके। वह अलग-अलग तरह के अम्ल (एसिड) पर काम करते थे जिसके कारण धीरे-धीरे उसके हाथों में काले धब्बे होने लगे। करीब डेढ़ वर्ष और बीत गया, लेकिन वह अपने चाचा और कारखाने को छोड़ने का साहस नहीं जुटा पाए। और छोड़ते भी कैसे? वो किसी और को जानते भी तो नहीं थे जिसके पास जा सकें।

फिर एक दिन वह काम पर नहीं गए। उस दिन जब पंडित जी बाहर चाय पीने गए तब उनकी मुलाकात संतोष दुबे (बदला हुआ नाम) नाम के एक व्यक्ति से हुई, जो ग्वालियर के एक मंदिर में पुजारी थे। जब संतोष ने पंडित जी के हाथों पर काले धब्बे देखे तो उन्होंने इसके बारे में पूछा तो पंडित जी ने उन्हें अपने काम के बारे में बताया। संतोष ने उसका नाम पूछा और फिर पंडित जी को नौकरी छोड़कर उनके मंदिर में पुजारी (उनके सहायक के रूप में) बनने की सलाह दी क्योंकि पंडित जी भी ब्राह्मण थे। संतोष ने उसे इस पर सोचने के लिए कहा और मंदिर का पता दिया। बाद में पंडित जी ने इस बारे में सोचा, उन्होंने सोचा कि किसी मंदिर में सेवा करना फैक्टरी में काम करने से बेहतर होगा। 2 दिन के बाद उसने अपने कपड़े बांधे और जो पैसा उन्होंने अपनी नौकरी में बचाए थे वह लेकर चुपचाप भाग गए।

उन्होंने संतोष जी के पास पहुंचकर उनके साथ पूजा पाठ करना शुरू कर दिया। मंदिर का पुजारी होने के नाते उनकी कोई वेतन नहीं थी लेकिन वह थोड़ी राहत महसूस कर रहे थे। उन्हें आवास और भोजन मिल रहा था। अगले 1 साल में उन्होंने संतोष जी से पूजा पाठ सीखा। वह जानते था कि पुजारी के रूप में सेवा करना अच्छा काम है, लेकिन वह जीवन भर ऐसा नहीं करना चाहते थे। परन्तु पुन: उनके पास कोई और विकल्प नहीं था इसलिए उन्होंने मंदिर में सेवा जारी रखने का फैसला किया। उन्होंने वहां अगले डेढ़ वर्ष तक सेवा की और उसके बाद बिना कुछ सोचे उन्होंने मंदिर छोड़ दिया।




उन्हें नहीं पता था कि कहां जाना है, कहां रहना है और क्या करना है। कुछ रातें उन्होंने सड़कों और रेलवे स्टेशन पर बिताई। बाद में उन्हें कराए पर एक साझा कमरा मिला। उसने पहले बचाए हुए पैसों से एक महीने का किराया दिया। किराए के पैसे देने के पश्चात उनके पास जो रुपये बचे थे उससे वो अगले महीने का किराया और कुछ दिन के खाने की व्यवस्था कर सकते थे।

उसके पास किसी दुकान में नौकर के रूप में काम करने का एक विकल्प था। उन्हें इस तरह का काम आसानी से मिल सकता था, लेकिन अब वो किसी के लिए भी काम नहीं करना चाहते थे इसलिए उन्होंने खुद से कुछ करने का फैसला किया । पंडित जी ने सोचा कि वह कुछ ऐसा शुरू करेंगे जिसके द्वारा वह दैनिक आधार पर कमा सकते हैं और फिर उन्होंने गन्ने के रस का काम शुरू करने का निर्णय लिया।

इसके लिए उन्हें एक ठेला और रस निकलने वाली मशीन की आवश्यकता थी। वह सबसे पहले पास के इलाके की कबाड़ी की दुकानों पर जाकर एक पुराना ठेला देखने के लिए गए। एक दुकान पर उन्हें पुराना ठेले मिला और सौभाग्यवश उसी दुकान पर गन्ने की पेराई के लिए लकड़ी की मशीन मिल गयी। ठेले के पहिए ठीक थे लेकिन उसका पटिया टूटा हुआ था और मशीन का हत्था भी टूटा हुआ था। परन्तु, उन्होंने दोनों खरीद लिए। अब बाकी बचे पैसों से वो गन्ने और कुछ और सामान ही ले सकते थे।

पंडित जी ने ठेले के पटिये को खुद से ठीक किया। अब मशीन को ठीक कराने के लिए वह उसे बढ़ई के पास ले गए, जिसकी दुकान पंडित जी के कमरे के पास थी। पंडित जी के पास मशीन की मरम्मत के लिए पैसे नहीं थे इसलिए उन्होंने इसके बदले में एक महीने तक प्रतिदिन बढ़ई को दो गिलास गन्ने का रस पिलाने का वादा किया। बढ़ई ने स्थिति को समझा और मुफ्त में मशीन मरम्मत की, साथ ही उसने ठेले पर मशीन भी लगा दी।

अब पंडित जी ने छह गिलास, कुछ बर्तन की व्यवस्था की और बाजार में अपना गन्ना रस का ठेला लगा दिया। प्रथम दिन से ही पंडित जी को ग्राहक मिलने लगे। उन्होंने पहले दिन की कमाई से कुछ गन्ने और उनके भोजन की व्यवस्था हो गई। वह सुबह 7 से रात 10 बजे तक काम करते थे और मात्र दिन के भोजन के लिए आधा घंटा का विराम लेते थे। गर्मियों के मौसम में उन्होंने गन्ने के रस के ठेले

को जारी रखा। लेकिन सर्दियों में उन्हें गन्ने का रस बेचना बंद करना पड़ा क्योंकि इसे चलाने के लिए पर्याप्त ग्राहक नहीं मिल रहे थे। अब उन्होंने अपने बचाए हुए पैसे से कॉफी एक पुरानी मशीन खरीदी और उसी स्थान पर कॉफी बेचना शुरू किया। अधिक ग्राहक पाने के लिए उन्होंने कुछ समय बाद साथ में टमाटर का सूप बेचना भी शुरू कर दिया। काम का बोझ बहुत ज्यादा था लेकिन वह बहुत खुश थे। पंडित जी अब ठीक ठाक कमाई कर रहे थे और कुछ पैसे बचा भी रहे थे। उन्होंने आस पास कुछ दोस्त भी बनाए। पंडित जी जानते थे कि, इस काम के साथ वह आसानी से जीविका चला सकते हैं लेकिन बेहतर भविष्य के लिए उन्हें अपना व्यवसाय विकसित करना होगा। एक वर्ष से अधिक बीत गया था परन्तु पंडित जी को अपने व्यवसाय को आगे बढ़ाने का कोई रास्ता नहीं मिल रहा था।




फिर एक दिन पंडित जी ठेले के पास चाय की दुकान करने वाले उनके एक दोस्त ने उन्हें सामने नवनिर्मित व्यावसायिक इमारत के भू-गृह (बेसमेंट) की एक दुकान के बारे में बताया। निर्माता को इस दुकान के लिए कोई ग्राहक नहीं मिल रहा था क्योंकि यह दुकान भू-ग्रह की सारी दुकानों में भी सबसे अंत में थी और कोई भी इसे कम कीमत पर भी खरीदना पसंद कर रहा था।

उस रात, घर जाने से पहले पंडित जी इस दुकान को देखने गए। उन्होंने दुकान में दो कमियां पायीं, एक दुकान छोटी थी और दूसरी यह मुख्य प्रवेश द्वार से दूर थी। घर जाकर उन्होंने इसके बारे में और सोचा। उन्होंने अपने किसी दोस्त से इस बारे में चर्चा नहीं की, उन्हें पता था कि सब उस पर हसेंगे। पंडित जी को भी खुद से भी लग रहा था कि वह इस स्थिति में दुकान खरीदने के लिए कैसे सोच सकते थे? जबकि उनके पास अग्रिम भुगतान (डाउन-पेमेंट) के लिए भी पर्याप्त धनराशि नहीं है और उन्हें बैंक से भी ऋण कैसे मिलेगा। उन्होंने तो कभी बैंक में खाता भी नहीं खुलवाया था।

हालांकि, इस दुकान के लिए पंडित जी के मन में सकारात्मकता थी। उन्होंने सोचा कि कम से कम एक बार उन्हें निर्माता से बात करनी चाहिए। वो निर्माता के दफ्तर गए और उससे मिले। उन्होंने भी पंडित जी से यही सवाल पूछे कि उन्हें बैंक से ऋण कैसे मिलेगा और क्या उनके पास अग्रिम भुगतान दे पाएंगे। पंडित जी जवाब नहीं दे पाए और वापस आ गए। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और दोबारा एक योजना के साथ निर्माता से मिलने गए।

निर्माता अच्छा इंसान था। पुन उन्होंने समय दिया और पंडित जी की योजना सुनी। पंडित जी ने कहा, ' मेरे पास अभी पैसा नहीं है, लेकिन मैं अग्रिम भुगतान छह महीने की किश्तों में कर सकता हूं। अगर मैं अग्रिम भुगतान छह महीनों में करने में विफल रहा तो आप दुकान किसी दूसरे ग्राहक को बेच देना। मुझे पता है बैंक मुझे ऋण नहीं देगा क्योंकि मैं कोई गारंटर या कोई भी चीज नहीं है जिसके बदले मुझे ऋण मिल सके। इसलिए दुकान की शेष धनराशि के लिए भी मैं सीधे आपको किस्तों में भुगतान करूंगा। हम रजिस्ट्री नहीं जब तक मैं आपको दुकान का पूरा भुगतान नहीं कर देता। पंडित जी ने उसको अपने अतीत के बारे में सब कुछ बताया और यकीन दिलाया की वो एक भरोसेमंद और सच्चे व्यक्ति है। सब सुनने के पश्चात निर्माता ने पंडित जी से दो दिन का समय बाद मिलने को कहा।




पंडित जी को इस बात का संतोष था कि कम से कम वह अपनी बात उसके सामने रख सके। उन दो दिनों में शायद निर्माता ने पंडित जी के ठेले और कमरे के आसपास के लोगों से पंडित जी के बारे में पता किया होगा। कुछ लोगों ने पंडित जी को बताया कि कोई अनजान व्यक्ति उनके बारे में पूछ रहा है। दो दिन के बाद निर्माता नई दुकान पर आया और पंडित जी को बुलाया। पंडित जी की योजना पर वह शर्तों के साथ राजी हो गया। पहली शर्त थी, जब पंडित जी पूर्ण अग्रिम भुगतान कर देंगे तब केवल यह सुनिश्चित होगा कि दुकान किसी अन्य व्यक्ति को नहीं बेची जाएगी। दूसरा, दुकान में प्रवेश और उपयोग की तारीख निर्माता तय करेगा, जो पूर्ण अग्रिम भुगतान के कम से कम एक वर्ष बाद की होगी। तीसरा, रजिस्ट्री दुकान की पूरी धनराशि अदा करने के बाद होगी और तब तक वे इसे किरायनमा के रूप में दर्ज करेंगे।

पंडित जी तुरंत राजी हो गए। उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। उन्हें ये एक सपने जैसा लग रहा था। उनकी आँखों से छलकते ख़ुशी के आंसू उनकी सच्चाई बता रहे थे। निर्माता ने उनसे मुंह मीठा करने को कहा। उस दिन से पंडित जी ने और अधिक मेहनत की। उन्होंने किश्तों का भुगतान करना शुरू कर दिया। लेकिन वह अग्रिम भुगतान छह महीनों में नहीं कर सके। हालांकि निर्माता ने एतराज नहीं किया और उन्हें दो महीने और दे दिए। पंडित जी ने निश्चित समय में इसका भुगतान किया। अब उन्होंने निर्माता की शर्तों के साथ लिखित दस्तावेज बनवाये। पंडित जी ने अब गन्ने के रस के साथ-साथ और फलों के रस भी बेचना शुरू कर दिया और एक नया सहायक भी रख लिया।

कुछ महीनों के बाद, गर्मियों में, एक दिन निर्माता उस जगह कुछ काम से आया और चिलचिलाती धूप में पंडित जी को मेहनत करते देखा। यह द्रश्य देख कर उसने पंडित जी को जल्द ही दूकान का कब्जा देने का फैसला किया। एक महीने के भीतर पंडित जी को दुकान मिल गयी और उन्होंने अपने नए जूस सेंटर का उद्घाटन किया। अगले 5 वर्षों में वह तेजी से आगे बढ़े। निर्माता ने खुद ही रजिस्ट्री करने को कहा जबकि दुकान की काफी धनराशि शेष थी।

जिस दिन वो मुझे अपनी सुना रहे थे उस समय तक दुकान की केवल अंतिम किस्त शेष थी। उनके पास ग्वालियर में दो मंजिला मकान और दो जमीनें थीं। उनके दो बच्चे थे और दोनों अंग्रेजी माध्यम विद्यालय में पढ़ रहे थे। और पंडित जी ने 'पराठा कॉर्नर ' नाम से नई दुकान भी शुरू की थी।

पंडित जी पढ़े लिखे नहीं थे और किसी के मार्गदर्शन के बिना भी अपना रास्ता बना लिया। वह सिर्फ अपने आत्म विश्वास और कड़ी मेहनत की वजह से यह कर सके।

बेहतर भविष्य बनाना परिस्काथितियों विषय नहीं है कदाचित यह एक सोच का विषय है।

इस कहानी से यह सिद्ध होता है कि-

“आपको पता है कि आप क्या हो लेकिन आप यह नहीं जानते कि आप क्या बन सकते हो।”




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