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३५ वर्षों के बंधन में, सुख ज्यादा – दुःख भूले हैं,

अपनों के संग मन भरके, मन से झुला झूले हैं|

मात-पिता से मिला जो चिंतन, मन के धन को छूते हैं,

उनसे जो आशीष मिला है, उसमें सब कुछ भूले हैं|

अपना एक परिवार बना है, अपनों के संग जीते हैं,

अपनों की सीमा में रहकर, कुल ड्योढ़ी को छूते हैं|

बच्चों के बचपन से अब तक, सच बोया सच पाया है,

दोनों के सपनों में हर दम, सच का बादल छाया है|

ईश्वर रहा दयालु हर पल, कर्म-धर्म निभ पाया है,

शेष रहा जो निभ जाने को, उजियारा मन में छाया है||     

 




Lokesh Rusia
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