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जब भी कोई झांसी के स्वादिष्ट व्यंजनों के बारे में बात करता है, तो यह नारायण चाट के उल्लेख के बिना अधूरा है। यदि आप झाँसी गए हैं और आपने नारायण चाट का स्वाद नहीं चखा तो हम कहेंगे की आपने झाँसी के एक अहम भाग का अनुभव नहीं लिया। ५८ वर्ष पुराना यह प्रतिष्ठान बिना प्याज और लहसुन से बनी चाट के स्वाद एवं गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध है। यदि आप झाँसी में हैं और जब भी आप नारायण चाट की स्वादिष्ट चाट का आनंद लेने जायेंगे तो आपको हमेशा वहां पर लोगों की भीड़ मिलेगी। कोई भी व्यक्ति इस दृश्य को देखकर यही कहेगा कि वे कितने भाग्यशाली और समृद्ध होंगे। एसा ही कुछ मैंने भी सोचा, परन्तु जब मेरी बात श्री अनिल विजय जी से हुई तब मुझे ज्ञात हुआ कि यहां तक पहुंचने के लिए उनके परिवार को बहुत संघर्ष और कठिनाइयों को पार करना पड़ा। पढ़ें नारायण चाट की सफलता की संघर्ष पूर्ण एवं प्रेरणादायक कहानी:

1947 की आजादी के बाद, नारायण दास विजय जी का पूरा परिवार कलकत्ता से सब कुछ छोड़कर झाँसी आकर बस गया। उस समय परिवार आर्थिक रुप से बहुत कमज़ोर था। कुछ वर्षों तक उन्होंने एक छोटी सी किराने की दुकान के सहारे घर चलाया। 1962 में घर के बेटे, नारायण ने एक विद्यालय की कैंटीन में समोसे की एक दुकान शुरू की। उनके भोजन को उस विद्यालय की लड़कियों ने बहुत पसंद किया।

कुछ वर्षों पश्चात, एक बार विद्यालय की प्राचार्या ने कैंटीन का किराया बढ़ाने का निर्णय किया। इस निर्णय का नारायण जी ने विरोध किया क्योंकि किराया बढ़ने से उन्हें या तो भोजन के दाम बढाने पड़ते या उसकी गुणवत्ता से समझौता करना होता। और यह दोनों ही बातें नारायण जी को मंजूर नहीं थीं। विद्यालय की प्राचार्या अपने निर्णय पर अटल रहीं और नारायण जी ने विद्यालय की कैंटीन छोड़ दी। उन्होंने विद्यालय के बाहर एक बहुत छोटी सी दुकान खोलकर, पुनः अपना स्वादिष्ट भोजन बेचना शुरू कर दिया। परन्तु यह विद्यालय के अधिकारियों का बिलकुल रास नहीं आया और पुलिस की मदद से दुकान हटवा दी और नारायण जी को पुलिस अपने साथ ले गयी। इस सब को देख विद्यालय की कन्यायें निराश हुईं और चुप नहीं बैठी। सभी कन्यायें ने इकट्ठे होकर इसका जमकर विरोध किया और परिणाम स्वरूप नारायण जी को पुलिस ने छोड़ दिया और उन्हें वापस पुराने किराये पर विद्यालय की कैंटीन में बुलाया गया।




सन १९७२ में उन्होंने विद्यालय की कैंटीन छोड़ दी और झाँसी शहर में एक छोटी सी 5/5 की दुकान लेकर जीवन यापन के लिए व्यापार शुरू किया। करीब अगले दस वर्षों तक उनका व्यापार तो सीमित रहा परन्तु उनके समोसे के स्वाद और गुणवत्ता की प्रशंसा झाँसी में अवश्य होती थी और साथ ही साथ अपनी ईमानदारी और कुशल व्यवहार से उन्होंने लोगों के मन में इज्ज़त बहुत कमा ली थी।

सन १९८४ में कुछ समस्याओं के चलते तत्काल ही नारायण जी को दुकान छोड़ना पड़ी। अब परिवार पर बड़ा संकट आन पड़ा था। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के साथ एकमात्र कमाई का सहारा जा रहा था। बाज़ार की कोई भी दुकान को अब किराये पर लेने के लिए किराये के साथ एक अमानती धनराशि की मांग सभी दुकानों के मालिक कर रहे थे। एसी आर्थिक स्थिति में अमानती धनराशि देना नारायण जी के लिए बिलकुल संभव नहीं था। कुछ दिनों के प्रयास के बाद सौभाग्य से उनकी स्पष्ट और ईमानदार छवि के कारण एक व्यक्ति ने अपनी दुकान को बिना अमानती धनराशि के दे दिया और इतना ही नहीं, उन्होंने नारायण जी से यह भी कहा कि जब भी वह किराया देने की स्थिति में हों तब दे सकते हैं। नारायण जी ने उन्हें पूरे एक वर्ष के बाद किराए का भुगतान किया। वह आदमी नारायण जी एवं उनके परिवार के जीवन में एक दूत के रूप में आया था और इसी के साथ "नारायण चाट" के नाम से नई दुकान पर पुनः व्यवसाय शुरू हो गया। दुकान बड़ी थी तो उत्पाद भी बढ़ गया। अब नारायण जी की पत्नी के साथ-साथ उनके तीनों बेटे भी, जो अभी छोटे थे और पढ़ रहे थे, काम में हाथ बटाने लगे।

सन १९९० में नारायण जी की पत्नी की बहिन और उनके पति की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गयी। इसका सदमा पूरे परिवार को लगा। पत्नी की बहिन के इकलौते बेटे को नारायण जी अपने साथ झाँसी ले आये और अपने ही साथ रखा। परिवार की आर्थिक स्थिति अब भी ठीक नहीं थी और इसका सीधा प्रभाव बच्चों की पढ़ाई पर पड़ा। सबसे बड़े बेटे मनोज की पढ़ाई तो अब तक छूट ही चुकी थी और दूसरा बेटा अशोक, जिसने कक्षा 10 में पूरे झाँसी जिला में प्रथम स्थान प्राप्त किया था, को भी पढ़ाई छोड़नी पड़ी। अब पूरा परिवार पूर्ण रूप से व्यवसाय में समय देने लगा था। भाग्यवश नारायण जी के एक पड़ोसी मेजर सहाय ने नारायण जी के दूसरे बेटे अशोक की आगे की शिक्षा कराने एवं उसका पूरा खर्च खुद उठाने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने अशोक का दाखिला आगरा के एक विद्यालय में कराया।




सन १९९४ में नारायण जी की पत्नी ने समोसे के साथ-साथ आलू की टिक्की को भी नारायण चाट की भोजन-सूची जोड़ने का विचार रखा क्योंकि चाट के उत्पादों में आलू की टिक्की प्रमुख है और इसकी खपत और लाभ भी अधिक था। पूरे परिवार ने इस विचार पर सहमति दिखाई। बहुत ही कुशलता एवं ठोस योजना के साथ नारायण चाट ने अपने उत्पादों में आलू की टिक्की का प्रमोचन किया।

हर वर्ष जून, जुलाई, अगस्त और सितम्बर, इन चार महीनों में सभी जगह आलू "कोल्ड स्टोर" का उपयोग होता था जिसके कारण आलू की टिक्की कुरकुरी नहीं बन पाती और ग्राहकों को स्वाद इन महीनों में स्वाद के साथ समझौता करना होता था। नारायण चाट ने इन्हीं चार महीनों में अपनी आलू की टिक्की का प्रमोचन करने की योजना बनाई। परन्तु उन्होंने अपनी टिक्की में आलू "कोल्ड स्टोर" वाला उपयोग न करने का निर्णय लिया और अच्छी गुणवत्ता का आलू खोजने में उन्होंने प्रयास किये। कई प्रयासों के पश्चात उन्हें सफलता प्राप्त हुई। उन्हें आगरा के पास एक जगह पर अच्छी गुणवत्ता का आलू मिल गया जिससे आलू की टिक्की कुरकुरी और स्वादिष्ट बन सकती थी। शीघ्र ही नारायण चाट ने आलू की टिक्की का प्रमोचन अपने प्रतिष्ठान पर किया और उनके ग्राहकों ने इसे बहुत पसंद भी किया। कई लोग आश्चर्यचकित हुए की जून जुलाई के महीने में भी नारायण चाट इतनी स्वादिष्ट आलू की टिक्की कैसे बना रहा है? धीरे-धीरे झाँसी में नारायण चाट की लोकप्रियता बढ़ने लगी।

अब नारायण जी के बेटे अशोक ने भी एक अच्छे कॉलेज से इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू कर दी थी। उनके सबसे बड़े बेटे मनोज और  सबसे छोटे बेटे अनिल मुख्य रूप से नारायण चाट को समय देते थे। और नारायण जी की बहिन का बेटा भी अपना समय यहीं देते थे  किन्तु सभी ने अपनी अधूरी छूटी हुई पढ़ाई को पुनः प्रारम्भ किया। अगले चार वर्षों में इसी प्रकार से नारायण चाट अपनी स्वादिष्ट चाट से झाँसी में अपनी पहचान बनाता रहा और साथ ही साथ अपनी भोजन-सूची में भी नए उत्पाद जैसे पानी के बतासे इत्यादि बढ़ाये।




सन १९९८ में अशोक की नौकरी एक अंतर्राष्ट्रीय बैंक में लग गयी और वो नौकरी के लिए कलकत्ता चले गए। इसी समय अशोक के मौसेरे भाई को भी झाँसी के बाहर सरकारी नौकरी मिल गयी थी। कुछ महीनों पश्चात अशोक को विदेश जाने का अवसर मिला और वो अमेरिका चले गए। अमेरिका जाकर अशोक ने कुछ धनराशि बचाकर अपने परिवार को व्यापार के लिए भेजी जिससे व्यापार में और अधिक वृद्धि हुई। अब नारायण चाट ने कच्चा माल एक साथ अधिक मात्रा में खरीदना शुरू किया जिससे माल कम दामों में मिलने लगा। इससे जो लाभ हुआ उसका भी उपयोग व्यापार के विकाश में किया गया। अब उन्होंने दो सहायकों को भी काम पर रख लिया जिससे उत्पादकता और अधिक बढ़ गयी।

सन २००० में, इमामी समूह, कलकत्ता के कुछ लोग झाँसी के पास स्थित प्रसिद्ध श्री रामराजा मंदिर, ओरछा दर्शन करने के लिए आए और इसी दोरान उन्होंने नारायण चाट के बारे में सुना। दर्शन के पश्चात वो लोग नारायण चाट की चाट का स्वाद लेने के लिए प्रतिष्ठान पहुंचे। उन्हें नारायण चाट का  स्वाद इतना पसंद आई की उन्होंने कलकत्ता में होने वाले उनके एक भव्य समारोह के लिए नारायण चाट को चुना और उस समय जब नारायण चाट की मासिक आमदनी १५ से २० हजार रुपये थी, इमामी समूह ने उन्हें  उन्होंने ३०,००० रुपये की चाट का प्रस्ताव दिया। इसके अतिरिक्त उन्होंने नारायण चाट से कुछ चुनिन्दा व्यंजन हर माह कलकत्ता भेजने का आग्रह किया। पिछले २० वर्षों से नारायण चाट आज भी अपने व्यंजन कलकत्ता भेजते हैं। नारायण चाट के लिए यह एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। एक व्यक्ति जिसने जीवन यापन के लिए समोसे बेचना सुरु कर आज पुरे झाँसी ही नहीं बल्कि बाहर के लोगों को भी अपने स्वाद से लोभान्भित कर दिया था । इसके बाद से ही नारायण चाट ने शादियों और समारोहों में अपनी चाट उपलब्ध कराना शुरू किया। अब झाँसी के आस पास के गाँव और शहरों के लोग भी नारायण चाट के नाम और स्वाद से परिचित होने लगे थे।




सन २००५ तक नारायण चाट ने अब झाँसी के सदर बाज़ार में अपनी खुद की जगह ले थी जिसमे नीचे वाले हिस्से में दुकान और ऊपर के हिस्से में परिवार के लिए घर बनाने की योजना थी जो की। सन २००७ में नारायण चाट ने अपने नए प्रतिष्ठान में प्रवेश कर लिया था। अपने पुरने ग्राहकों को अपने नए प्रतिष्ठान से जोड़ने का कार्य भी उन्होंने एक अच्छी योजना बनाकर किया। उन्होंने अपने पुराने प्रतिष्ठान को बंद नहीं किया और उसमें मात्र पानी के बतासे रख कर, उसे अगले दो वर्षों तक उसे नए प्रतिष्ठान के साथ-साथ चलाया। इससे कभी भी उनके ग्राहक पुराने प्रतिष्ठान से निराश होकर नहीं लौटे और उनको नए प्रतिष्ठान के खुलने की जानकारी भी हो गई। सन २००९ में उन्होंने अपने पुराने प्रतिष्ठान को बंद कर दिया। अब तक अशोक ने भी अमेरिका में अपनी खुद की कंपनी शुरू कर दी थी। अशोक अपने अभिनय के शौख को पूरा करने की ओर अग्रसर हुए और "मसाला कॉमेडी क्लब" नाम से अमेरिका में एक हास्य संघ शुरू किया। झाँसी में भी नारायण जी के सबसे बड़े मनोज और सबसे छोटे बेटे अनिल ने नारायण चाट की कमान अपने हाथ में ले ली थी। अगले दस वर्षों में उन्होंने नारायण चाट को नई उचाइयां दी।

आज नारायण चाट झांसी और आस-पास के सभी गाँव शहरों में प्रसिद्ध है। नारायण चाट ने स्वाद एवं गुणवत्ता के साथ कभी समझोता नहीं किया। सर्वाधिक आचार्य करने वाली बात यह है कि नारायण चाट ने कभी भी अपनी स्वादिष्ट चाट में  प्याज और लहसुन का उपयोग नहीं किया। ५८ वर्ष पहले शुरू हुए इस सफर में पुरे परिवार ने बहुत मुश्किलों का सामना किया परन्तु सभी के सामूहिक प्रयासों से न केवल उन्होंने समस्याओं पर विजय प्राप्त की बल्कि झाँसी और उसके बाहर एक बड़ी पहचान बना ली। यदि आप झाँसी में हैं या कभी झाँसी जाएँ तो नारायण चाट का स्वाद अवश्य चखें।

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