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ज़िन्दगी को बहुत करीब से देखा है|

जांचा है – परखा है,

माँ को मिट्टी - गोबर से घर लीपते देखा है,

कुआँ से पानी लाने में, उसे हांफते हुए देखा है|

ज़िन्दगी को बहुत करीब से देखा है|

ज़िन्दगी को कभी सिसकते तो कभी संवरते देखा है,

कभी अपनों को, मुकरते हुए देखा है|

ज़िन्दगी को बहुत करीब से देखा है|

उम्मीदों से सींचे हुए, पले – पुसे घर को,

तिनका सा – बिखरते हुए देखा है|

ज़िन्दगी को बहुत करीब से देखा है|

अल्हड़ बचपन को, सोंधेपन के मन को, यौवन को,

ज़िम्मेदारी की चाशनी में, घुलते हुए देखा है|

ज़िन्दगी को बहुत करीब से देखा है|

 




D. K. Rusia
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