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सपने पूरे करने की एक सीमित समय सीमा होती है। अगर आप यह मानते हैं तो शायद यह कहानी आपके विचार बदल सकती हैं। एक साधारण से बच्चे से एक बड़े अफसर बनने की कहानी जानने के लिए, पढ़ते रहिए।

मैं अपने कागजों में उलझा था जब मैंने उस बच्चे की तरफ देखा। उसकी आंखों में एक अलग सी चमक थी और जितने गौर से वो मुझे देख रहा था शायद मैंने भी कभी किसी और को वैसे ही देखा था। मैंने अपना काम समेटा और उठ कर उसके पास जाकर बैठ गया। मुझे देख कर वो थोड़ा हिचकिचा गया और थोड़ा दूर हट कर बैठ गया। मैंने उसकी तरफ बड़े प्यार से देखा और बोला, “बेटा तुम यहां क्या कर रहे हो।“ उसने बड़े सहम कर जवाब दिया कि, “मैं अपने पापा के साथ यहां आया हूं।“

वो फिर से मेरी तरफ उन्ही आंखों में चमक लेकर देखने लगा तो मैंने उससे पूछा, “तुम क्या जानना चाहते हो।” उसने जवाब दिया, “आप ही की तरह मुझे भी उस कुर्सी पर बैठना है और लोगों की सेवा करनी है पर मेरे मन में संकोच है कि शायद मैं यह नहीं कर पाऊंगा, मैं वहां तक पहुंच ही नहीं पाऊंगा।“

मैं थोड़ा मुस्करा दिया और कहा, “तो यह बात है, चलो मैं तुम्हें अपनी कहानी सुनाता हूं।“




जब मैं चौथी कक्षा में था तब हम अपने गांव से मऊरानीपुर आए थे। मऊरानीपुर के पास स्थित नौगांव (छतरपुर, मध्य प्रदेश) में GCM Convent School से मैंने अपनी चौथी से छठी कक्षा तक की शिक्षा पूरी की। सातवीं कक्षा में मेरे पिताजी ने मुझे सरस्वती विद्यालय छतरपुर में दाखिला करा दिया था। वहां पर मैंने नौवीं कक्षा तक पढ़ाई करके दसवीं कक्षा में, मैं इलाहाबाद पढ़ने चला गया। अपनी उम्र के हिसाब से मैं काफी जल्दी बड़ा होने लगा था। इलाहाबाद में अकेले रहने की वजह से कपड़े धोना, खाना बनाना इत्यादि जैसे काम मुझे करना आ गया था। पढ़ाई में अच्छा होने के कारण मेरे पिताजी चाहते थे कि मैं इंजीनियर बनूं पर मेरा रुझान आर्ट्स के क्षेत्र में था। फिर भी उनके कहने पर मैंने गणित के साथ अपनी बारहवीं कक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की। लेकिन जब कॉलेज का विचार आया तो मैं बी.ए. करने के लिए अडीग रहा। तब मैंने तरह - तरह की ताने सुने कि अगर बी.ए. ही करना था तो इलाहाबाद पढ़ने की क्या जरूरत थी यहीं पर कर लेते। मैंने हार नहीं मानी।

इसी बीच मेरे पिताजी ने मुझे एक चिट्ठी लिखी। वह चाहते थे कि मैं इंजीनियरिंग ही करूँ, अगर वह नहीं तो कम से कम बी.कांम या बी.एससी ही सही। अंत में उन्होंने लिखा कि “आगे तुम खुद समझदार हो।” पत्र में लिखे इन अंतिम शब्दों ने मुझे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने के लिए बाध्य किया। मेरे बड़े भैया ने मेरा साथ दिया। वह स्वयं भी सिविल सेवाओं की परीक्षाएं दे रहे थे और मेरे अधिकारी बनने के सफर में एक वही थे जो मेरा साथ शुरुआत से निभा रहे थे।

34000 बच्चों के बीच कड़ा मुकाबला करके मैंने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में अपने पसंद के कोर्स में दाखिला लिया। बी.एच.यू. के शिक्षक और वहां की पढ़ाई विश्व स्तरीय थी। वहां पहुचकर कक्षा के कुछ छात्रों से मेरा मेल हो गया और हम सभी दोस्तों ने मिलकर एक समूह बनाया जिसे हम FOG - D (Friends of Geology Deportment) कहते थे। इस समूह में मेरे साथ मेरे मित्र चन्दन, अल्केंद्र, शेखर, हरीश, धम्मेश और KK मुख्य रूप से थे और हम सब मिलकर एक ही दिशा में अध्ययन करने लगे। यहाँ के सभी मित्र, जिनमे से कई आज  बड़े अधिकारी हैं, ने मेरा साथ अंत तक दिया।

कॉलेज के पहले वर्ष का एक वाकया मुझे अभी तक याद है और जब भी मैं उदास होता हूं तो उसे याद कर लेता हूं। कॉलेज के पहले सत्र की परीक्षाओं के कुछ दिन बाद जब मैं एक दिन क्रिकेट खेल रहा था तभी मुझे सत्र की परीक्षा के परिणाम आने की खबर मिली। मैं अपना परिणाम देखने के लिए कॉलेज पहुंचा और कतार में लगा तो मेरी कक्षा के सारे छात्र इकट्ठे होकर मेरे पास आए और उन्होंने मुझे बताया कि मैंने 70% अंकों के साथ पूरे विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान किया है। मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था तो मेरे दोस्तों ने मुझे मेरा प्रमाण पत्र दिखाया तब मुझे जाकर विश्वास हुआ। उस समय मेरे पास ज्यादा पैसे नहीं हुआ करते थे और जब मेरे दोस्तों ने मुझे पार्टी के लिए कहा तो मैंने अपने भैया को फोन लगाया और उन्हें बताया। वह बहुत खुश हुए और उन्होंने मुझे कहा कि या तो तुम किसी दोस्त से उधार ले लो या घर आ जाओ और पैसे ले जाओ। वहां पर किसी भी तरह मैंने अपने दोस्तों को पार्टी दी और घर आ गया। मैं रात को बीच-बीच में उठकर अपना प्रमाण पत्र देखता था, खुद को यह विश्वास दिलाने के लिए की यह सपना नहीं सच है। कॉलेज के दूसरे साल में मेरे अंक पिछले वर्ष से और बढ़ गये।




मैंने कभी फिजूलखर्ची में विश्वास नहीं किया जैसे मैं साइकिल से ही कॉलेज जाया करता था। साथ ही खुद को बेहतर बनाने के अलग-अलग तरीके ढूंढा करता था। कॉलेज के पहले साल में मैंने अपनी लिखावट को अच्छा करने के लिए बहुत कड़ा परिश्रम किया था, इतना की जिस दोस्त से लिखावट सीख रहा था मेरी खुद की लिखावट उससे बेहतर हो गई थी। लिखावट अच्छी करने का मुख्य कारण था कि अगर आपके विचार अच्छे हैं पर आप उनको अच्छी तरह सामने नहीं ला पा रहे हैं तो उसका कोई अर्थ ही नहीं है। 75% अंकों के साथ मैंने अपनी स्नातक उत्तीर्ण की। फिर मैं स्नातकोत्तर की तैयारी करने लगा। मैंने तीन कॉलेजों में जिसमें बीएचयू, जेएनयू और इलाहाबाद यूनिवर्सिटी शामिल है,  की प्रवेश परीक्षा दी और तीनों में ही मुझे सफलता प्राप्त हुई। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी का मेरा समय इतना अच्छा गया था कि मैंने वहीं रहने का फैसला किया। पर शायद वक्त को यह मंजूर नहीं था।

घर के हालात बिगड़ने लगे थे। पिता जी अपनी नौकरी से सेवा-निवृत्त हो चुके थे और भैया को भी सिविल सेवा की परीक्षाओं में सफलता नहीं मिली थी। ऐसे में पिताजी दोनों बच्चों की पढ़ाई का खर्च नहीं उठा सकते थे। घर की इन परिस्थितियों को देखकर मुझे अपने स्नातकोत्तर की पढाई करना और इलाहाबाद में रहना ठीक नहीं लग रहा था और मुझे जल्द से जल्द नौकरी पाकर घर की परिस्थितियों को संभालना आवश्यक लगने लगा। अतः मैंने सरकारी विद्यालय में शिक्षक बनने हेतु बी. एड. करने का सोचा। मैंने झांसी आकर बी.एड. की प्रवेश परीक्षा दी और इस परीक्षा को प्रथम स्थान से उत्तीर्ण किया। प्रथम स्थान प्राप्त करने के कारण मुझे छात्रवृत्ति मिली और मेरी फीस भरने में भी कोई दिक्कत नहीं आई।

लोग अकसर विषम परिस्थितियों में या जिम्मेदारियों के कारण अपने सपने को भूल जाते हैं, लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया। बी.एड करते हुए भी मैंने अपने लक्ष्य को कभी अपने दिमाग से हटाया नहीं। बी. एड. की पढाई के दौरान मैं अपना कुछ समय सिविल सेवा की परीक्षाओं के लिए अवश्य देता था।




बी. एड. के अंतिम सत्र के समय एक और समस्या मेरे सामने आ खड़ी हुई। सन 2007, सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की भर्ती हेतु आवेदन शुरू हो चुके थे। आवेदन देने के लिए बी.एड. का प्रमाण पत्र अनिवार्य था, लेकिन हमारा कॉलेज हमारी परीक्षाएं नहीं ले रहा था। उस समय मेरे लिए नौकरी पाना अत्यंत आवश्यक था। इस समस्या के समाधान के लिए मैंने, कॉलेज के छात्रों के साथ मिलकर एक संघ बनाया और आंदोलन का नेतृत्व किया। मैं बड़े-बड़े अधिकारियों से मिला और हमारी परीक्षाएं जल्द से जल्द करने का आग्रह किया। अंत में जाकर उन्होंने परीक्षाएं जल्दी करा दी। एक और आंदोलन मैंने परीक्षाओं के परिणाम को जल्दी लाने के लिए किया और वह जल्दी आ भी गया। उस समय एक छात्र ने कोर्ट जाकर आखिरी तारीख पर रोक लगवा दी और कोर्ट ने आवेदन की आखिरी तारीख बढ़ा दी। आवेदन देने के पश्चात मैं नतीजे का इंतजार करने लगा। इस बीच मैंने सिविल सेवा की परीक्षाओं के लिए अपने प्रयासों को और अधिक कर लिया था, मासिक पत्रिकाओं को पढ़ना और अन्य तरह की प्रतियोगिता की किताबों को पढ़ना शुरू कर दिया था।

सन 2008, ख़ुशी का अवसर आया, मेरा चयन बतौर प्राथमिक शिक्षक हो गया था और हमने राहत की सांस ली।  शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र डाइट, बरुआसागर में मेरा प्रशिक्षण शुरू हुआ। उसी समय, प्रशिक्षण के दौरान मेरी मुलाकात विक्रम से हुई और हम अच्छे दोस्त बन गए। दोनों ही सिविल सेवा की परीक्षाओं की तैयारी कर रहे थे। मैं अपने परिवार के साथ कम रहता था क्योंकि वहां पढ़ाई का माहौल नहीं होता था और विक्रम के साथ अधिक रहता था। धीरे-धीरे हालात और बिगड़ने लगे और मैं विक्रम के साथ ही रहने लगा था। वह मेरी बहुत मदद किया करता था। हम दोनों साथ ही पढ़ाई किया करते थे। आगे कुछ महीने मैं उसके साथ ही रहा।

जल्दी ही मेरी प्रविष्टि हो गई और मैंने बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। विद्यालय जाना ही काफी कठिन होता था पहले अपनी गाड़ी से नदी तक जाना फिर नाव के अंदर गाड़ी को रखकर नाव चलाना और नदी को पार करना फिर दुबारा  गाड़ी चलाकर स्कूल पहुंचना। इस समय मेरा घर भी बन रहा था। इन्हीं सबके बीच मेरी पढ़ाई पर काफी बुरा असर पड़ा। एक दिन मैं ऐसे ही अपने बनवाने के काम में व्यस्त था तो मेरे दोस्त का मुझे फोन आया और उसने मुझे UP PCS की परीक्षा देने के लिए पूछा तो मैंने उसे मना कर दिया कि मेरी पढ़ाई नहीं हो रखी है। मेरी मां ने मुझे बात करते हुए सुन लिया था उन्होंने मुझसे कहा कि तुम परीक्षा क्यों नहीं दे रहे हो, भले ही पढ़ाई ना हुई हो परीक्षा देने में कोई हर्ज नहीं है। मैं तैयार हो गया और एक कलम तक नहीं लेकर गया था, मैंने वहां बैठे परीक्षक से ही कलम मांग ली। यह देखकर वहां बैठे सभी लोग मुझ पर हंसने लगे। मैंने उन्हें नजरंदाज कर पूरे ध्यान परीक्षा समाप्त की। कुछ समय बाद मेरे दोस्त का मुझे फोन आया उसने बताया कि मैंने UP PCS की प्रारंभिक परीक्षा उत्तीर्ण कर ली है यह सुनकर मैं दोबारा पढ़ाई में जुट गया। मैंने अपना ध्यान बाकी सभी जगह से हटा कर अपनी तैयारी पर लगा दिया। मुख्य परीक्षा के लिए मैंने स्वतः ही कड़ी मेहनत की लेकिन UP PCS की मुख्य परीक्षा में मैं 2.25 अंको से रह गया। लेकिन अभी भी मैंने अपने मनोबल को टूटने नहीं दिया और अपने सपने को पाने की आस रखी। मैं निरंतर प्रयासरत रहा और सभी परीक्षाएं देता रहा परन्तु सफल नहीं हुआ।




2012 में मेरी शादी हो गई थी। भैया ने भी अपना खुद का व्यापार शुरू कर लिया था और साथ ही उन्होंने राजनीति के क्षेत्र में अपना रुझान बढ़ा लिया था। 2012 में ही विक्रम ने, सामाजिक सेवा को ध्यान में रखकर अपना एक कोचिंग सेंटर शुरू किया और मुझे भी उस में पढ़ाने के लिए पूछा। यह सोच कर कि मैं अपना आज तक का अर्जित किया हुआ ज्ञान बच्चों में बांट सकता हूं और शायद उन्हें जिंदगी में सफल बना सकता हूं मैंने वहां पढ़ाना शुरू कर दिया। 3 बच्चों से शुरू कर के हमने 3 वर्षों में लगभग 300 से अधिक बच्चों को परीक्षाओं के लिए तैयार किया है। अलग-अलग तरह की सरकारी नौकरियां  जैसे शिक्षक, पुलिस ऑफिसर और कई सिविल परीक्षाएं पास करा कर जिंदगी में कुछ करने के लिए प्रेरित किया। मैंने तुम्हारी तरह ही कई बच्चों को पढ़ाया है। मुझे इतना विश्वास है कि भले ही सारे छात्र परीक्षाएं पास ना कर पाए हैं पर सब एक अच्छे इंसान बनकर अपना जीवन जी रहे होंगे। बच्चों के साथ ही साथ मैंने कई प्रयास किये परन्तु मैं असफल रहा




अब मैं हताश होने लगा था और समय इतना ज्यादा हो चूका था की बचपन के सपने को साथ लेकर चलना मुश्किल हो रहा था लेकिन शायद मेरे प्रयासों को देखकर मेरी पत्नी को मेरे सपने का महत्व समझ आ गया था। मेरी पत्नी ने हमेशा मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया है। एक ऐसे समय पर जब मैं दोबारा से परीक्षा देने का सोच भी नहीं रहा था, सिर्फ वही थी जिसने मुझे प्रेरित किया और मेरा फॉर्म भरवाया। मैंने परीक्षाएं दी और इस बार भी मैंने MP PSC की प्राथमिक परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। मुख्य परीक्षा की तैयारी करने के लिए मैंने कोचिंग लेना शुरू कर दिया। जब मेरा कोचिंग का पहला दिन था, उसी दिन वहां पर एक परीक्षा हो रही थी। मैंने परीक्षा देने मना किया क्योंकि मैं तैयार नहीं था। लेकिन वहां के अध्यापक ने मुझे कहा कि मैं तुम्हारे अंक किसी को नहीं बताऊंगा, तुम सिर्फ परीक्षा दे दो। मैंने परीक्षा दे दी और जब उसका परिणाम आया तो 158 अंकों के साथ में वहां द्वितीय आया। मेरा मनोबल दोबारा से ऊंचा हो गया और मैं जी जान से लग गया पढ़ाई में। मैंने इसको अपना अंतिम अवसर समझकर दिन रात पढाई की। इस वार मुझे मुख्य परीक्षा में सफलता मिली। अगला चरण साक्षात्कार (Interview) का था जिसमें मैंने बहुत ही सहजता से उत्तर दिए।

मेरे साक्षात्कार (Interview) के समय भी मैं हर सवाल का जवाब मुस्कराते हुए दे रहा था तो वहां बैठे अधिकारी ने मुझसे पूछा कि तुम इतना क्यों मुस्करा रहे हो, कोई समस्या आएगी तो तुम तब भी मुस्कराओगे? मैंने जवाब दिया कि हां मैं मुस्करा लूंगा क्योंकि मुस्कराने से समस्या हल नहीं हो जाती कम जरूर महसूस होने लग जाती है।




जब परिणाम आया तो मझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ? मैंने MP PCS की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी और मेरा बचपन का देखा हुआ सपना जिसे मैंने वर्षों से संजोया था, अब वो पूरा होने जा रहा था। मेरा परिवार बहुत खुश था। मेरे पूरे सफ़र में जिन लोगों भी मेरा साथ उन सभी को मेरा दिल धन्यवाद कर रहा था। प्रशिक्षण के पश्चात मुझे मुख्य नगरपालिका अधिकारी (Chief Municipal Officer) का पद सँभालने का अवसर प्राप्त हुआ।

इन सबके बीच मेरी पत्नी ने कई सारे बलिदान किये और चुपचाप सब सहती रही और मेरा साथ देती रही। मेरी मां हर समय में मुझे प्रेरित करती रही। भैया हर मुश्किल के वक्त साथ खड़े रहे व मेरे दोस्त मदद करते रहे। इतने कम साधनों में और इतनी विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए अगर मैं अपना सपना इतने समय बाद भी पूरा कर सकता हूं  तो तुम क्यों नहीं?”

अपने इस सवाल और अपनी कहानी के साथ, मैं उस बच्चे को वहीं बैठा छोड़कर अपने डैस्क पर वापस आ गया।




Ritika Singh
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