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यह गाँव में जन्मी एक युवा महिला के धैर्य, साहस और दृढ़ संकल्प की कहानी  है जो अवरोधों और दमनकारी समाज के मानदंडों को पछाड़ कर खुद के लिए एक जगह बनाने की कोशिश करती है। यह कहानी इस बात की पुष्टि करती है कि इस दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं है यदि आप सच में उसे प्राप्त करना चाहते हैं । कहानी की मुख्य नायिका है सुनीता साहू, जिन्होंने अपने पति पुष्पेंद्र साहू के बेहिचक समर्थन के साथ , एक प्रभावशाली सफलता की कहानी बुनी, जो वास्तव में महिलाओं के लिए एक प्रेरणादायक कहानी है।

सुनीता साहू का जन्म उत्तर प्रदेश के सरसई नाम के एक गांव में सन १९७७ में हुआ। अपनी साधारण जीवन शैली के बावजूद, सुनीता के माता-पिता ने अपने बच्चों के लिए सुन्दर भविष्य का सपना देखा। बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की परिकल्पना करते हुए, उनके पिता पास की ही तहसील "राठ" में आ कर बस गए, जहाँ सुनीता का दाखिला एक अच्छे विद्यालय में हुआ। कक्षा दस तक की शिक्षा उन्होंने राठ से ही पूर्ण की। परन्तु सुनीता का मन पढाई में कम और रचनात्मक कार्यों में अधिक लगता था। उनकी रूचि कला और शिल्प के क्षेत्र में ज्यादा थी।

1994 में दसवीं कक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् सुनीता का विवाह सागर के व्यवसायी पुष्पेंद्र साहू से करा दिया गया। एक सुखद जीवन का सपना लिए सुनीता ने अपने वैवाहिक जीवन में प्रवेश किया। सुनीता के नए निवास में उनके जेठ और जेठानी भी साथ रहते थे। सुनीता के सास-ससुर झाँसी के पास स्थित अपने गृहनगर मऊरानीपुर में रहते थे। एक प्रेमपूर्ण और अच्छे जीवन साथी को प्राप्त कर सुनीत बहुत प्रसन्न थी और मन ही मन भगवान् धन्यवाद देती थी। भविष्य में आने वाली गंभीर समस्याओं से अनजान सुनीता और पुष्पेन्द्र अपने सुखद जीवन की कल्पना कर आगे बढ़ने लगे।

अपने परिवार और अच्छे पास पड़ोसियों के बीच एक गृहणी के रूप में सुनीता ने लगभग अगले ६ महीने बहुत अच्छे से व्यतीत किये। परन्तु कुछ समय पश्चात उन्हें प्रतीत हुआ की आस पास के लोगों का व्यव्हार जैसे बदलने लगा हो। किसी भी बातचीत में लोग सुनीता पर अवश्य ही कुछ न कुछ ताना कस देते थे। धीरे-धीरे उन्हें पता चला कि वहां लोग उनकी अपूर्ण शिक्षा और अपर्याप्त घरेलू कौशल का मजाक बना रहे थे। कुछ दिनों तक तो सुनीता इसे नज़रंदाज़ करती रहीं किन्तु यह सिलसिला थमा नहीं और सुनीता परेशान रहने लगी। इस सब को देख सुनीता के के पति पुष्पेन्द्र ने गृहनगर मऊरानीपुर जाने का एक कठिन निर्णय ले लिया।

मऊरानीपुर पहुँच कर सुनीता को अपनी परेशानियों से राहत मिली और अपने सास-ससुर और पति के साथ पुनः घर बसाने लगीं। पुष्पेंद्र ने नए व्यापार में कदम रखा। उन्होंने गानों की कैसेट और उसकी रिकॉर्डिंग की दुकान खोली। सुनीता घर के कामों में व्यस्त हो गई और वो हमेशा अपने ससुराल वालों का बहुत समर्पण से ख्याल रखने की कोशिश करती थी। घर गृहस्थी में व्यस्त होने के बाबजूद सुनीता मन बेचैन था। लोगों द्वारा कसे हुए ताने उनके दिल में घाव कर गये थे और पता नहीं कब उन्होंने लोगों को गलत सावित करने का एक संकल्प मन ही मन ले लिया।




विवाह के एक वर्ष पश्चात्, 1995 में, सुनीता ने अपनी शिक्षा को आगे बढ़ाने की इच्छा व्यक्त की। परिवार उनकी इस इच्छा का पूर्ण समर्थन किया और सुनीता ने पुनः विद्यालय में दाखिला लिया। देखते ही देखते सुनीता ने ग्यारहवीं और बारहवीं अच्छे अंकों से उत्तीर्ण कर ली। एक लंबे अरसे के बाद, वह खुद को गर्वित महसूस कर रही थीं। उन्हें अहसास हुआ कि वो भविष्य में कुछ अच्छा कर सकती हैं। समय बीतता गया और विवाह को अब तीन वर्ष हो चुके थे। परन्तु अब तक सुनीता और पुष्पेंद्र को बच्चा नहीं हुआ था। और स्वभाभिक रूप से लोगों के बीच खुसफुस शुरू हो चुकी थी। आस-पास के लोगों ने उन्हें इलाज कराने की सलाह देने लगे थे परन्तु उस समय उनके लिए उपचार का खर्च उठाना संभव नहीं था।

सुनीता और पुष्पेन्द्र को आगे आने वाली मुश्किलों की भनक लग चुकी थी और इस समस्या से परेशान सुनीता दुखी रहने लगीं। रोजमर्रा के कामों के बाद दिनभर घर में खाली रहना मुश्किल होने लगा था। सुनीता को अब अपना मन कहीं और लगाने की ज़रूरत थी और इसलिए उन्होने छोटे बच्चों को पढ़ाने का सोचा। उन्होंने पास -पड़ोस के बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। और शीघ्र ही उन्होंने सिलाई और कढाई का कार्य भी शुरू कर दिया जिसे लोगों ने बहुत सराहा। कुछ ही दिनों में सुनीता को सिलाई का इतना काम मिलने लगा कि उनको बच्चों को पढ़ना छोड़ना पड़ा। इससे उनको बहुत आत्मबल मिला। एक वर्ष बीत गया और सुनीता की आकांक्षाएं बड़ी हो गईं। वह अब काम के साथ-साथ आगे पढना भी चाहती थी। उनकी इच्छा को ध्यान में रखते हुए पुष्पेन्द्र ने उनका दाखिला एक स्थानीय कॉलेज में बी.ए. में कराया। सिलाई का काम, कॉलेज और घरेलू काम के साथ, सुनीता एक बहुत व्यस्त जीवन शैली में बांध गयीं थी। परन्तु वह इस सब में बहुत प्रसन्न थी।

उस समय घुंघट रखने का चलन आज की तुलना में अधिक था जिसके चलते अपने ससुर के सामने वह हमेशा घूँघट डालके ही जाती थीं। इसलिए, उनका अपने ससुर से सीधे बात करने का कोई प्रावधान नहीं था। कुछ पूछने-बताने के लिए चम्मच और थाली से आवाज करना होता था, हालाँकि कुछ वर्षों बाद उनके ससुर ने उनसे सीधे बात करने के लिए कह दिया था। एक ओर इस प्रकार के पुराने चलन को निभाते हुए काम करना और दूसरी ओर कॉलेज जाकर पढाई करना,  रूढ़िवादी और आधुनिक मूल्यों के मिश्रण का यह एक आदर्श उदाहरण था।

पुष्पेंद्र का व्यापार अच्छे से फल-फूल रहा था और अब उनकी आर्थिक स्थिति ठीक हो चुकी थी। अपने परिवार के समर्थन के साथ, सुनीता ने अपनी गर्भावस्था का उपचार करने का फैसला किया। करीब दो वर्षों के इलाज के बाद भी कोई सफलता नहीं मिला, जिससे सुनीता बहुत निराश हो गई। और इस सब के चलते सुनीता के सिलाई के कार्य पर भी बुरा असर पड़ा और वह कार्य बंद करना पड़ा। परन्तु सुनीता पुनः कुछ शुरू करने का सोचने लगीं और अबकी बार उन्होंने महिला श्रंगार का काम सीखने का विचार पुष्पेन्द्र को बताया। सुनीता को महिला-श्रंगार के क्षेत्र में कार्य करने का मन बहुत पहले से था। इस बार उन्हें अपने सास-ससुर को समझाने में अधिक समय लगा परन्तु वह मान गए।




उन्होंने सर्वप्रथम भोपाल के एक प्रशिक्षण केंद्र में जाकर शिक्षण लेने का सोचा। परन्तु वहां उन्होंने सलाह दी की सुनीता को पहले गृहनगर में मूल प्रशिक्षण प्राप्त करना चाहिए। मऊरानीपुर में मूल प्रशिक्षण के लिए सुनीता की सास उन्हें एक अच्छे महिला-श्रंगार केंद्र (ब्यूटी पारलर) ले गयीं। सुनीता ने वहां काम सीखना शुरू कर दिया था। वह एक अच्छी छात्रा थी जो रचनात्मक कार्यो को बहुत खूबसूरती से करतीं और हमेशा नई तकनीकों को सीखने के लिए उत्सुक रहती थीं। शीघ्र ही सुनीता के घर पर श्रंगार के छोटे काम, जिनकी कीमत 100 रूपये से अधिक नहीं होती थी, के लिए ग्राहक आने लगे। परन्तु सुनीता इतने में भी खुश हो जाति थीं क्योंकि वह अब अपने मन का काम कर रही थीं। उन्हें लग रहा था कि वह अपने जीवन के सबसे अच्छे दौर में हैं, वो अपनी मेहनत से मिली सफलता के हर पल का आनंद ले रही थीं। हालाँकि, उनकी खुशी के क्षण अल्पकालिक थे।

कुछ मतभेदों के चलते सुनीता ने संस्थान छोड़ दिया। पुष्पेन्द्र ने उनको बहार के एक संस्थान में प्रशिक्षण और खुद का पारलर खुलवाने का वादा किया। उन्होंने सुनीता का उत्साहवर्धन किया। अपने वादानुसार, पुष्पेन्द्र ने सुनीता को भोपाल प्रशिक्षण संस्थान में दाखिला दिलवाया। पहली वार अकेले एक बड़े शहर में रहना सुनीता के लिए चुनौतीपूर्ण था। परन्तु जल्द ही सुनीता ने शहर के तौर तरीके सीख लिए। संस्थान में प्रशिक्षण की मुख्य भाषा अंग्रेजी थी जो सुनीता के मार्ग में एक वाधा बन रही थी।  उन्होंने प्रशिक्षण केंद्र में इसके लिए बात की और बहुत अनुनय-विनय के बाद आखिरकार उन्होंने संस्थान को हिंदी में प्रशिक्षण देने के लिए मना लिया। जल्द ही सुनीता ने अपना परीक्षण पूरा कर लिया।

यह वर्ष २००५ था, सुनीता और पुष्पेंद्र को अभी भी कोई बच्चा नहीं था। उनके अवचेतन मन में इस समस्या के कारण दुःख का भाव था। पुष्पेन्द्र इस तथ्य से अच्छी तरह वाकिफ थे कि सुनीता भीतर से बहुत उदास हैं और शायद इसीलिए वो सुनीता का पूरे दिल से समर्थन कर रहे थे ताकि सुनीता दुःख से उबर सकें।

भोपाल से वापस आकर, सुनीता ने घर में ही "सोम्या ब्यूटी पारलर" नाम से अपना महिला-श्रंगार केंद्र खोला। परन्तु सुनीता को कुछ बातों का ध्यान रखते हुए यह पार्लर चलाना था। उन्होंने अपने परिवार से वादा किया था कि वह केवल मऊरानीपुर में रहकर ही काम करेंगी और उसके बहार जाकर करने वाला कोई भी काम नहीं लेंगी। धीरे-धीरे सुनीता को स्थानीय दोस्तों और रिश्तेदारों से बाल काटना, वैक्सिंग जैसे काम मिलने लगे।




सुनीता ने खुद का व्यापर शुरू करने का भले ही उस मतभेद के चलते सोचा था परन्तु उन्हें अहसास था कि यह फैसला उनका जीवन बदल सकता है। सुनीता का प्रमुख सहारा उनकी दोस्त अंजलि थी जिन्होंने उनके व्यवसाय को फलने-फूलने में मदद की। अंजलि ने सुनीता के नए पार्लर के बारे में अपने मित्रों, रिश्तेदारों और पास पड़ोसियों को बताया। धीरे-धीरे ही सही लेकिन व्यापार ने आकार लेना शुरू कर दिया था।

सुनीता को बड़ी सफलता अंजलि की एक मित्र से मिली। वह मऊरानीपुर एक समारोह में भाग लेने के लिए विदेश से आयी थीं। सुनीता को उनके श्रंगार का काम मिल गया और उन्होंने पूरे दिल से इस कार्य को किया। परिणाम स्वरूप उनके काम को बहुत सराहना मिली। हालांकि सुनीता ने अपने प्रशंशनीय कार्य के लिए अधिक शुल्क नहीं लिया। वह अपने काम से बहुत खुश थीं। अब सुनीता के पार्लर पर कुछ ग्राहक नियमित हो गए थे और कुछ ही समय में उन्हें मऊरानीपुर में ही एक शादी में वधु-श्रंगार का कार्य मिल गया जिससे बड़े पैमाने पर उनको एक पहचान मिली। सुनीता का व्यापर अब धीरे-धीरे सफलता की सीढियाँ चढ़ना शुरू कर चुका था।

अब समय अंजलि की शादी का था जो कि मऊरानीपुर के बहार होने वाली थी। अंजलि को अपने श्रंगार के लिए सुनीता के अतिरिक्त किसी और पर भरोसा नहीं था। इसमें केवल अड़चन सुनीता का अपने परिवार से किया वादा थी। सुनीता के कई दिनों के प्रयासों के पश्चात् उनके घरवाले उन्हें शादी में भेजने के लिए तैयार हो गए क्यूंकि अंजलि और उनके परिवार से उनकी पुरानी जान-पहचान थी। और इसी के साथ सुनीता को वधु-श्रंगार के लिए और काम मिलने लगे और उनका व्यसाय अच्छे से स्थाप्तित होने लगा।

इसी बीच, पुष्पेंद्र ने मोबाइल का व्यवसाय प्रारंभ कर दिया था और अपने क्षेत्र में बहुत अच्छा कर रहे थे। सुनीता ने भी अपने कार्य-कौशल को बढाने के लिए दिल्ली के एक प्रसिद्ध संस्थान से त्वचा - उपचार का प्रशिक्षण लिया। इसके पश्चात उनके व्यापर में और वृद्धि हुई। और इन्ही वर्षों में सुनीता ने एम. ए. और बी. एड. की डिग्री भी पूरी कर ली थी। इसी के साथ उनकी शिक्षा को लेकर मिले लोगों के तानों का उत्तर उन्होंने दे दिया था। सुनीता ने अलग-अगल तरह के श्रृंगार के प्रशिक्षण लेकर श्रंगार की नयी-नयी तकनीकें सीखती रही और अपने कार्य-कौशल में निरंतर उन्नति करती रहीं।

कई वर्षों के श्रमसाध्य काम के बाद, परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत हो चुकी थी। वे अब अपने जीवन की सबसे बड़ी बाधा "गर्भावस्था उपचार" पर ध्यान केंद्रित कर सकते थे। उन्होंने ग्वालियर के एक अस्पताल में उपचार लेना शुरू किया, जिसके लिए अक्सर ग्वालियर की यात्रा करनी पड़ती थी। बहुत सारा समय और धन खर्च करने के बाद भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी और चिकित्सक ने यह तक कह दिया कि शायद सुनीता गर्भधारण नहीं कर सकती हैं। हालाँकि इस बात को अस्वीकार करके, युगल ने आगरा में अधिक उन्नत और महंगे IVF उपचार कराने का फैसला लिया। दो वर्ष और बीत गए परन्तु अब भी कुछ सार्थक परिणाम नहीं मिला था।




वर्ष २००८, शादी को अब १४ साल हो चुके थे परन्तु अब तक भी घर के आँगन में बच्चे की किलकारी नहीं गूंजी थी। दो वर्ष आगरा में IVF उपचार के बाद उन्होंने इंदौर के एक चिकित्सक से उपचार लेना शुरू कर दिया था और बहुत कोशिशों के पश्चात ख़ुशी की किरण दिखने लगी। सुनीता अब गर्भवती थीं। दोनों के जीवन में कई वर्षों के इंतेज़र के ख़ुशी आई थी और पूरा परिवार भी बहुत प्रसन्न था। परन्तु यह ख़ुशी ज्यादा दिन नहीं टिकी। कुछ ही महीनों में चिकित्सकों ने बताया की बच्चे के दिल में छेद है।

चिकित्सकों की बार-बार दी हुई चेतावनी और परिवार के समझाने के बावजूद सुनीता बच्चे के मोह में गर्भधारण करे रहीं जिसके चलते कुछ जटिलताएं पैदा हो गयीं और सुनीता की जाना तक पर बात आ गयी। अंत में बच्चे का गर्भपात करना पड़ा। इस सब ने सुनीता और पुष्पेन्द्र को भीतर से तोड़ दिया और अत्यधिक दुखी कर दिया। अब सुनीता के सास-ससुर गंभीर रूप से उपचार के खिलाफ हो गए क्यूंकि उनके विचार से यह सब सुनीता को बीमार कर सकता था। उन्होंने उपचार को पूर्णतः बंद करने के लिए कहा।

परन्तु युगल ने IVF के परिक्षण कराना बंद नहीं किया जबकि उन्हें हमेशा नकारात्मक परिणाम ही मिल रहे थे। एक दिन पुष्पेन्द्र के एक मित्र ने उन्हें वैष्णो देवी धाम चलने को कहा। पुष्पेन्द्र और सुनीता वैष्णो देवी के दर्शन के लिए मित्रों के साथ चले गए। वहां जाकर उनके मन को बहुत शांति मिली और उसके बाद वह साल में दो तीन बार वैष्णो देवी की यात्रा कर लेते थे। साथ ही साथ सुनीता और पुष्पेन्द्र का व्यवसाय भी अच्छा चल रहा था। परन्तु IVF के परिक्षण का परिणाम साकारात्म नहीं आ रहा था इसीलिए इंदौर के चिकित्सक ने भी अब जवाब दे दिया था की सुनीता गर्भधारण नहीं कर सकती हैं।

अपनी आखरी उम्मीद टूटती देख सुनीता भी पूरी तरह से टूट चुकीं थीं। पुष्पेन्द्र ने मन ठीक करने के लिए पुनः शीघ्र ही वैष्णो देवी जाने की योजना बनाई। अपनी समस्या से दुखी सुनीता इस बार वैष्णो देवी के मंदिर में घंटो बैठ कर बिलख बिलखकर रोती रहीं और उन्होंने कहा कि यदि यहाँ से जाने के बाद उनकी यह परेशानी दूर नहीं हुई तो वह कभी भी वापस वैष्णो देवी नहीं आएँगी। और फिर चमत्कार हुआ, कुछ ही दिनों में सुनीता बिना किसी उपचार के सामान्य रूप से गर्भवती हो गयीं। तुरंत ही सुनीता और पुष्पेंद्र ने यह खबर इंदौर के चिकित्सकों को दी। खबर सुनकर चिकित्सकों को झटका लगा और सर्वप्रथम उन्होंने अविश्वाश दिखाया फिर उन्होंने युगल को परिक्षण के लिए इंदौर बुलाया। मानो माँ दुर्गा ने दंपति पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया हो, चिकित्सक इस चमत्कार को चिकित्सा की दृष्टि से समझा ही नहीं सके।

सुनीता ने सामान्य प्रसव के माध्यम से एक स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया जिसको उन्होंने "आस्था" नाम दिया। बेटी के जन्म ने उन्हें समृद्धि मिली और उनके व्यापार ने सोच से कहीं अधिक तरक्की की। सुनीता श्रंगार की नवीनतम तकनीकों जैसे एयरब्रशिंग और नई कार्यप्रणालियों में सक्षम हो गयीं थी। सुनीता का व्यापार इतना आगे बढ़ गया था कि उसके प्रवंधन हेतु पुष्पेन्द्र की आवश्यकता पड़ने लगी और धीरे-धीरे पुष्पेन्द्र को अपना व्यापार कम करना पड़ा। मऊरानीपुर के आस पास के लोग भी अब सुनीता के महिला-श्रंगार केंद्र में आने लगे थे। सुनीता का वधु-श्रंगार नगर में प्रसिद्ध हो गया था। जीवन हर तरह से बहुत सुन्दर हो गया था परन्तु हमेशा की तरह ही, उसके जीवन में अच्छी चीजें ज्यादातर अल्पकालिक थीं।

पुनः दम्पति सदमे में आ गए जब उन्हें पता चला की आस्था को डाउन-सिंड्रोम अर्थात उसके मानसिक विकाश में कमी है। वो आस्था को कई चिकित्सकों और अस्पतालों में लेकर गए परन्तु सभी ने आस्था के उपचार और सामान्य जीवन जीने की बहुत कम उम्मीद बताई। आस्था की बिमारी से परेशान सुनीता-पुष्पेन्द्र को मुंबई के एक चिकित्सक ने उम्मीद की किरण दिखाई। परिक्षण के बाद उन्होंने बताया कि आस्था डाउन सिंड्रोम के गंभीर रूप से पीड़ित नहीं है, सिर्फ उसके विकास में देरी हो रही है। उन्होंने दम्पति को सलाह दी कि वो आस्था का प्रशिक्षण बहुत अच्छे से करें ताकि वह बिना सहारे के अपने दैनिक कार्य करने में समर्थ रहे। कुछ वर्षों पश्चात दम्पति को एक पुत्र हुआ जिसका नाम उन्होंने "विश्वाश" रखा।

इतनी परेशानियों और कई वर्षों के बाद पुष्पेन्द्र और सुनीता के जीवन में अब स्थिरता आई है। उनका व्यापार अब आसमान छू रहा है और एक छत के नीचे बच्चों के साथ वो खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे हैं। उनकी सफलता की कहानी सिर्फ भाग्य से नहीं बल्कि दृढ़ संकल्प, मेहनत और विश्वास के दम पर बनी है।




Shanu Pande

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