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थी अँधेरी रात की,

 और थी तन्हाइयाँ ।

बंद आँखों मे मेरी,

आ गयी परछाइयाँ।

 

नील सी आँखें थी जिसकी,

 रेशमी थे बाल।

झील सी यौवन थी जिसकी,

   मखमली थे गाल।

 

बंद आँखों मे मेरी आ गयी परछाइयाँ...

 

था खड़ा चकोर सा देखने उस चाँद को,

फूल सी खुशबू थी जिसमे,

और थी सरगोशियां।

 

बंद आंखों मे मेरी आ गयी परछाइयाँ...

 

साँस थी सुरूर थी,

आत्म बल और गुरुर थी,

सहर (सवेरा) थी संसार थी,

बाहुबल का सार थी ।

 

बंद आँखों मे मेरी आ गयी परछाइयाँ...

 

नफ (नफरत) की एक छोटी सी किरणें,

आ गिरी परछाइयों मे,

आँख खुलते खुद को पाया,

 

फिर वही तन्हाइयाँ, फिर वही तन्हाइयाँ…

 

 

Praveen Mishra
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