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क्यूँ लगती है ज़िन्दगी इतनी कठिन?
क्या सिर्फ इसलिए की रोज़ अधूरे मन से ऑफिस जाना होता है...
या बस इसलिए की  शाम को आकर माँ की ममता का अधूरापन रह जाता है...

क्यूँ लगती है ज़िन्दगी इतनी कठिन?
क्या सिर्फ इसलिए की रोज़ अधूरे मन से बॉस को विश करना पड़ता है...
या बस इसलिए की रोज़ सुबह पिता जी का आशीर्वाद नहीं मिल पता है..

क्यूँ लगती है ज़िन्दगी इतनी कठिन?
क्या सिर्फ इसलिए की रोज़ अनजाने लोग मुझसे मिलते हैं, हालचाल लेते हैं, मेरा नया दुःख जानने की कोशिश  करते हैं...
या बस इसलिए की कई महीनों तक, मैं अपनी बहनों से मिल नहीं पाता या उनसे लड़ नहीं पाता
या उनसे उनका कुछ छीन नहीं पाता, क्यूंकि मैं सबका लाड़ला था...

क्यूँ लगती है ज़िन्दगी इतनी कठिन?
क्या सिर्फ इसलिए की रोज़ एक नया इंसान, दोस्त बनता है और छूट जाता है...
या बस इसलिए की जो कभी नहीं छूटते, उनसे मुलाकात का सिलसिला बन नहीं पाता...

क्यूँ लगती है ज़िन्दगी इतनी कठिन?
क्या सिर्फ इसलिए की रोज़ हर किसी में वो प्यार ढूंढ़ता हूँ, और हर रोज़ प्यार हो जाता है...
या बस इसलिए की जो एक मुकम्मल मोहोब्बत थी, उनसे अब मिल नहीं पाता हूँ...

क्यूँ लगती है ज़िन्दगी इतनी कठिन?
जब रात को बिस्तर पर तीन बजे जाता हूँ,
तो विचार का एक बबंडर साथ ले जाता हूँ...
फिर थक हार कर, पांच बजे उठ कर,
ऐसे ही खुद से कुछ बातें कर लिया करता हूँ...

अब सपना ये नहीं की अच्छी नौकरी हो...
अब सपना ये भी नहीं की मेरे पास पैसा हो...
अब सपना ये भी नहीं बोहोत लोग मेरी ज़िन्दगी में हों..
तो क्या है इसका मतलब, अब कोई सपना नहीं?

सपना है...
अब कुछ ऐसा कर जाऊं...
जिनसे मेरी ज़िन्दगी है...
उनके साथ मैं रह पाऊं...

सपना है...
अब कुछ ऐसा कर जाऊं...
की जब रात को तीन बजे जब बिस्तर पर जाऊं...
तो बस आराम से सो जाऊं...

 

Akash Dubey
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One thought on “दुविधा

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