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क्यूँ ये बेपरवाह सी लड़की बड़ी हो गयी?

क्यूँ अचानक सब कम सा और

सपने इच्छाओं से बड़े देख लिए?

क्यूँ जिसको हमेशा से कुछ अलग

करना था दूसरों के लिए,

आज खुद की ख्वाहिशों के लिए

भीड़ में कहीं खो गयी?

 

क्यूँ जो सब अपने थे उनसे बात नहीं होती?

और नए रिश्तों में आने का डर सोने नहीं देता|

क्यूँ अब मैं दिल की ना सुनूँ?

क्यूँ अब मैं बच्चों जैसे खुल कर ना हसूं?

शायद इसलिए बोलते हैं,

लड़की शादी में सब कुछ पीछे छोड़कर आती है|

सब कुछ नहीं शायद खुद को...

 

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