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कौन कहता है, अजान और शंख ध्वनि कान फूंकते हैं।

कुरआन और रामायण से इंसान इंसानियत ढूँढ़ते हैं।

 

लाखों हिन्दू गले मिलते हैं ईद की नवाज़ के बाद,

आतंक का साया चलन कुर्वान न कर दे।

 

चादर चढाने हम भी मज़ारों पर पहुंचते हैं।

दहशत का इशारा, करम कुर्वान न कर दे।

 

यहां कोई नहीं बैठा,ज़हर के फन से डसने को,

तोड़ दो दांत ज़हरीले, अगर कोई यहाँ रहता।

 

चलो घर-घर, घरों में ढूंढ लो अपने,

सपोलों को कुचलना है, क्यों न भाई हों अपने।

 

जो जाली नोट देते हैं, ज़ुल्म को जोश देते हैं,

तुम्हारा भ्रम है जीने का, वो तुमको मौत देते हैं।

 

जो नादानी में फसते हैं , इंसानियत मार देते हैं,

आत्मघाती बना देते, अपनों को दूर करते हैं।

 

हैं वे खून के प्यासे, कैसे खून से नाते,

घात करते हैं धोखे से, काफिर हैं डरे भागे।

 

न कोई धर्म है इनका, न कोई कर्म है इनका,

तिरंगे पे बना देखा चक्र ही, खौफ है इनका।

 

सीमा को छु नहीं सकते, ये हिंदुस्तान कहता है,

भारत माँ के आँचल में कुरआन का मान रहता है। 

 

कौन कहता है, अजान और शंख ध्वनि कान फूंकते हैं।

कुरआन और रामायण से इंसान इंसानियत ढूँढ़ते हैं।

 

 

Lokesh Rusia
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