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यह कहानी एक ऐसे योद्धा को समर्पित है, जिसने उम्मीद का साथ कभी नहीं छोड़ा।

कैंसर न प्यार को कमजोर बना सकता है, न ही उम्मीद की रौशनी को धीमा कर सकता और न ही इंसान की इच्छा शक्ति को धूमिल कर सकता है। मैं इस बात पर बहुत ज्यादा विश्वास करती हूँ की इंसान की इच्छा शक्ति से बड़ा कुछ भी नहीं है।

आज मैं अपने आपको को बहुत सौभाग्यशाली महसूस कर रही हूँ की मुझे ऐसी युवा लड़की के संघर्ष की कहानी लिखने का मौका मिला जिसने ज़िन्दगी जीने के लिए मानो तूफान ही रोक दिया। वह जानती थी कि कैंसर ने उसके साथ लड़ाई शुरू कर दी है, लेकिन उसने दृढ़ निश्चय किया की अपनी जीत के साथ वह इस लड़ाई को ख़त्म करेगी।

जनवरी 2017 , प्रियंका तावरे की ज़िन्दग़ी में सब कुछ अच्छा चल रहा था। एक प्यारा परिवार, अच्छे दोस्त और MBA पूरा होने के बाद एक संतोषजनक नौकरी। प्रियंका को कॉलेज के साथ साथ ही नौकरी मिल गयी थी। कुछ महत्वाकांक्षाओं के साथ प्रियंका दिन प्रति दिन अपने जीवन में आगे बढ़ रही थी।

उसके बाद कुछ ऐसा हुआ जो कोई सपने में भी नहीं सोचता। कुछ दिन बीमार होने के बाद प्रियंका को पता चला की वह जिसे छोटी बिमारी समझ रही है असल में वो पेरिकार्डियल एफ़्यूज़न से पीड़ित है।  सामान्य भाषा में कहा जाये तो उसके दिल के पास पानी जमा था और यह साधारण  पानी नहीं था बल्कि संक्रमित पानी था। तारीख थी 14 फरवरी 2017 , वैलेंटाइन डे जो युवा जोड़ो के लिए बहुत मायने रखता है जो प्यार और दिल का त्यौहार माना जाता है , आज उसी दिन उसका दिल प्यार की बजाय दर्द से भरा थ। उसके दिल में  सिर्फ जीवन को गले लगाने की लालसा थी।

आने वाले कुछ दिन डॉक्टरों के संक्रमण के कारणों को समझने और उससे कैसे खत्म किया जा सकता है के प्रयासों और विचारों में गया। 2 डी इको ( एक प्रकार का अल्ट्रासाउंड जिससे दिल एवं उसके अंदरूनी तस्वीरें दिखता है ) उसमें पाया गया की प्रियंका का दिल पानी में तैर रहा है।  एक ऐसी लड़की जिसे  बचपन में कभी मामूली सा बुखार भी न आया हो उसके लिए ऐसी बिमारी की का होना किसी सदमे से कम नहीं था।

प्रियंका को अपने सिस्टम से संक्रमित पानी निकालने के लिए एक ऑपरेशन थियेटर में स्थानांतरित करना पड़ा। उसने अपनी परिस्थिति  को  समझने और उसका सामना करने की कोशिश की, 6 से 7 मीटर लंबाई के 5 मिमी पाइप को उसके शरीर में  डाला गया ताकि संक्रमित पानी को बाहर निकाला जा सके । जब डॉक्टरों ने 1.5 लीटर पानी निकाला तो वह चकरा गए। यह परीक्षा थी उसके धैर्य की, क्योंकी उसे किसी भी प्रकार का अनेस्थिसिआ देकर बेहोश नहीं किया गया था और पूरी प्रक्रिया ठीक उसकी आँखों के सामने हुई ,उसने सबकुछ स्क्रीन पर देखा। पाइप को अभी भी 4 दिनों के लिए उसके शरीर के अंदर छोड़ दिया गया था, ताकि ये देखा जा सके की पानी कहीं से फिर से तो नहीं आ रहा। इस पूरी प्रक्रिया के अंत में लगभग २ बोतल संक्रमित पानी निकला। ये सब अपने बच्चे के साथ होते हुए देखना किसी भी माता - पिता  के लिए बहुत ही मुश्किल होता है। ऐसे समय में माता पिता और मरीज़ का पूरा परिवार अंदर से टूट जाता है।

इसी दौरान वह संक्रमित पानी जांच के लिए भेजा गया और इस रिपोर्ट में  कैंसर, टीबी इत्यादि की रिपोर्ट नेगेटिव आई। 10 दिन ICU में रखने के बाद प्रियंका को डिस्चार्ज किया गया। डॉक्टर्स ने पुरे हालात का निष्कर्ष निकालते हुए कहा कि या तो यह संक्रमण किसी वायरल संक्रमण की वजह से या फिर वायु प्रदुषण की वजह से हुआ था।




प्रियंका को हॉस्पिटल से आने के बाद करीबन 3 महीने लग गए अपने सामन्य दिनचर्या में वापस आने में जिसमें ऑफिस से घर और घर से ऑफिस आना शामिल था।  ज़िन्दग़ी अभी कुछ सामन्य होने ही लगी थी की प्रियंका को खाँसी की शियाकत होने लगी। जो आगे जाकर सांस फूलने, चक्कर आना और भूख ना लगने जैसे लक्षणों के साथ और ज्यादा तकलीफदायक होने लगी। यह खाँसी करीबन 3 हफ्ते से अधिक रहने की वजह से प्रियंका के पास फिर से हॉस्पिटल जाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा था। इस बार फिर से 2 डी इको टेस्ट हुआ जिसके परिणाम ने प्रियंका को अंदर से हिला कर रख दिया।  इसमें पता चला की प्रियंका के दिल के पास एक ट्यूमर है, यह पता चलते साथ ही उसे बिना किसी देरी के तुरंत हॉस्पिटल में भर्ती करना पड़ा। डॉक्टर्स इस असमंजस में थे की यह सच में किसी प्रकार का ट्यूमर है या फिर सामन्य सी जमा हुई चर्बी थी। बाद में डॉक्टरों ने प्रियंका को 10 दिनों के लिए ब्लड-थिनिंग इंजेक्शन (खून को पतला करने वाला इंजेक्शन) इस उम्मीद के साथ दिया कि यह खून के थक्के को पतला करने में मदद करेगा। इसके लिए प्रियंका के पेट में बहुत ही तकलीफदाय इंजेक्शंस लगाए गए। पर अफ़सोस इतनी तकलीफ सहन करने के बाद भी इसका कोई सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आया। डॉक्टरों के पास बायोप्सी (प्रक्रिया जिसमें ट्यूमर से एक कोशिका को लैब में जांच करने के लिए निकला जाता है) करने के अलावा कोई और रास्ता नहीं रह गया थ। डॉक्टरों ने बायोप्सी की सलाह तो दी पर उनका मानना था की इसे करने के लिए किसी विशेषज्ञ की आवश्कयता होगी क्युकी ट्यूमर उसके दिल और फेफड़ो के बीच में था थोड़ी सी भी गलती दिल को नुकसान पहुँचा सकती थी।

इन सब में प्रियंका अपने दर्द से ज्यादा दुखी इस बात से थी की उसके माता पिता को एक ऐसे हॉस्पिटल को ढूंढ़ने में भाग दौड़ करनी पड़ रही है जो उसके इस मुश्किल मामले को स्वीकार कर उसकी बायोप्सी करने के लिए तैयार हो जाये। प्रियंका के माता पिता को थोड़ी राहत तब मिली जब बहुत सी कोशिशों के बाद सानपाड़ा (MPCT) कैंसर स्पेशिलिटी हॉस्पिटल (संपदा) जो की प्रियंका की बायोप्सी करने के लिए तैयार हो गए थे। रातो रात प्रियंका को अचेत अवस्था में इस हॉस्पिटल में भर्ती किया गया।

सामान्य परिस्थितियों में, बायोप्सी ऑपरेशन थियेटर्स (ओटी) में किए जाते हैं, लेकिन मामले की जटिलता को देखते हुए इसे सीटी स्कैन बिस्तर में बायोप्सी का संचालन करने का निर्णय लिया गया। सीटी स्कैन मशीन ने डॉक्टरों की टीम को उसके ट्यूमर की सटीक जगह  का पता लगाने में मदद की। यह पूरी प्रक्रिया 30 मिनट चली, और अंत में एक स्केल और पेन का उपयोग करके सही जगह निशान लगा  पाए। इस प्रक्रिया में ऊपरी शरीर में एक इंजेक्शन-पंप (एक नोजल के साथ) डाले गए , जिसके माध्यम से 3 नमूने बायोप्सी के लिए निकले गए। इस प्रक्रिया के दौरान, प्रियंका पूरी तरह से होश में थी और उसे बहुत ज्यादा दर्द हो रहा था। पिछली बार की तरह भी इस बार भी उसे कोई अनेस्थिसिया नहीं दिया गया थ। ये सब उसके लिए बहुत ही दर्द और चुनौती भरा अनुभव था उसके हाथ, पैर  और गले को बाँध दिया गया था वह सब अपनी आँखों से देख रही थी कि किस तरह सुई उसके शरीर के अंदर गई और उसने महसूस किया पंप साइफन को जिसने जांच के लिए कोशिका का नमूना बाहर निकाला। इतनी तकलीफ के बाद भी प्रियंका ने अपने अंदर कि भावनायें बाहर दिखने नहीं दी। वह खुद को बार बार याद दिलाती रही की मुझे सांस लेना है ,मुझे जीना है ज़िन्दग़ी इतनी छोटी नहीं हो सकती और ये उस ज़िन्दग़ी का सिर्फ एक छोटा हिस्सा है पूरी ज़िन्दग़ी नहीं है, तो सांस लो और ज़िन्दग़ी जियो ये पल अभी गुज़र जायेगा।

वो तकिये में सर छुपा कर थोड़ा सा रो लेती थी इतना की उसके माता-पिता को उसके आंसू और उसका दर्द न दिखे। वह नहीं चाहती थी की उसके माता पिता उसको ऐसा रोता हुए देख कर और परेशान और दुखी हो जाए। विडंबना यह है कि उसके माता-पिता खुद उसके नमूने जांच के लिए टाटा मेमोरियल सेंटर ले गए ,क्योंकि उसकी प्रक्रिया शाम 4 बजे समाप्त हो गई और TATA मेमोरियल सेंटर शाम 5 बजे बंद हो जाता है । उनके लिए यह एक समय के विपरीत दौड़ थी। वे कुछ घंटों की देरी भी नहीं चाहते थे। प्रियंका के माता-पिता द्वारा उन्मत्त प्रयासों के बावजूद, उस की रिपोर्ट में लगभग एक महीने की देरी हुई। ये एक महीने उसके लिए गहरी पीड़ा के दिन थे; प्रियंका अपनी बीमारी और शारीरिक और मानसिक दर्द के बीच फंस गई थी। 25 दिनों के बाद, यह पता चला कि उसकी बीमारी एक दुर्लभ कैंसर का रूप है , जिसे एंजियोसारकोमा कैंसर (कैंसर युक्त ट्यूमर जो रक्त वाहिका के अस्तर के भीतर दिखाई देता है) कहा जाता है। यह सॉफ्ट टिश्यू का कैंसर था। विडंबना यह है कि प्रियंका पूरे देश में दूसरी ऐसी व्यक्ति थी जो  इस दुर्लभ बीमारी से पीड़ित थी।




अब जब पता चल गया था की प्रियंका को कैंसर नाम की बिमारी का सामना करना ही है तो ये वक़्त था उस पर तेजी से काम करने का। प्रियंका के आगे बहुत लम्बा और मुश्किल रास्ता सामने था पर उसने इस रास्ते पर चलने और उसपर विजयी होने का दृढ़ संकल्प किया।  इसके बाद के कुछ दिन कीमोथेरपी (कैंसर की कोशिकाओं को सर्जिकल तरीके से नष्ट किया जाता है) की प्रक्रिया में गुज़र गए।  यूँ तो नियमित कैंसर के मामलों में, डॉक्टर सर्जरी के बाद कीमोथेरेपी का सुझाव देते है और अंत में शेष रोगग्रस्त कोशिकाओं को मारने के लिए विकिरण का उपयोग किया जाता है। चूँकि प्रियंका का मामला बहुत सवेंदनशील था इसलिए डॉक्टरों ने किसी प्रकार की भी सर्जिकल प्रक्रिया को ना करने का निर्णय लिया। ऑन्कोलॉजिस्ट ने 12 कीमोथेरपी के सत्रों को तुरंत शुरू करने का सुझाव दिया। टाटा मेमोरियल जो की कैंसर के दुर्लभ मामलो के लिए जाना जाता है प्रियंका के माता-पिता ने उसको वहां भर्ती करने के लिए बहुत कोशिश की लेकिन यह सब व्यर्थ साबित हुआ क्यूंकि वह हॉस्पिटल पूरी तरह से भरा हुआ था। उन्हें पता चला की तीन महीने बाद वहाँ जगह मिल सकती है पर तीन महीने तक इलाज के लिए रुकना संभव नहीं था क्यूंकि सरकोमा बहुत ही तीव्र गति से फैलता है जिसे तुरंत उपचार की आवश्यकता होती है। प्रियंका को तुरंत एक निजी हॉस्पिटल में भर्ती करवा कर कीमोथेरपी सत्र शुरू किया गया। यह सत्र 12 सप्ताह करने का निर्णय लिया गया ( एक कीमोथेरेपी सत्र / सप्ताह)।

इस प्रक्रिया में प्रियंका को हर मंगलवार हॉस्पिटल में भर्ती होने और कई तरह के खून की जांच से गुजरना पड़ता था यह पता लगाने के लिए कि क्या उसका शरीर कीमोथेरपी के आने वाले सत्रों को सहन कर पायेगा है या नहीं। प्रत्येक चक्र में लगभग 8 घंटे लगते थे, जिसमें शक्तिशाली दवाओं का एक मिश्रण उसके शरीर के अंदर जाता था। पहले सत्र में प्रियंका को उसके हाथों की नसो के द्वारा दवा उसके शरीर के अंदर डाली गई।  इस पहले सत्र ने उसे पूरी तरह से पस्त कर दिया वह बहुत थका और असहज महसूस करने लगी उसे ऐसा लग रहा था का की उसका शरीर दवाइयों के बोझ से भर गया है। इस पूरी प्रक्रिया ने उसके पाचन प्रक्रिया को बहुत बुरी तरह से प्रभावित किया, उसे खाने के बारे में सोच कर ही उल्टी जैसा महसूस होता था। डॉक्टरों ने उसे प्रोटीन युक्त खाना खाने की सलाह दी ताकि उसके शरीर को ताकत मिले।

उसके अगले कीमो सत्र को पैर के माध्यम से दिया गया था क्योंकि कई परीक्षणों और प्रक्रियाओं ने उसकी हाथ की नसों को क्षतिग्रस्त कर दिया था । डॉक्टरों ने उसे भीषण दर्द से बचाने के लिए उसके शरीर के ऊपरी हिस्से में एक कीमो-पोर्ट डालने का फैसला किया। शुक्र था की इस बार की यह प्रक्रिया उसे अनेस्थेसिआ देकर किया गया ताकि उसके पहले से कमज़ोर शरीर को कोई और अतिरिक्त दर्द का सामना न करना पड़े।

जैसे ही तीसरा सत्र खत्म हुआ प्रियंका को अपने जीवन के सबसे बुरे सपने का सामना करना पड़ा। उसके लम्बे घने बाल, जिसपे उसे बहुत नाज़ था वो भी इस बिमारी का शिकार हो गए। कठोर दवाईओं के सेवन के परिणामस्वरूप उसके बाल गिरने लगे थे। यह उसके धैर्य की अंतिम परीक्षा थी । उसे अब कोई न कोई कदम उठाना था उसने एक योद्धा की तरह स्थिति का सामना करने का निश्चय किया, वह सीधे सैलून गई और उसने अपने सर के सारे बाल साफ़ कर लिए । यह प्रियंका का एक बहुत साहसिक निर्णय था। और इस परीक्षा में अकेले वो अकेले नहीं थी, उसके भाई ने भी अपना समर्थन और एकजुटता दिखाने के लिए अपना सर मुंडवा लिया। उसे लगा की कम से कम वह अपनी प्यारी बहन का साथ देने के लिए इतना तो कर ही सकता है। एक भाई का अपनी बहन के लिए इतना प्यार देख कर सैलून के कर्मचारी भी भावुक हो गए और ये बात सभी के दिल को छू गई।




सीख - जब आपके के पास इतना प्यार करने और हर कदम पे साथ देने वाला परिवार हो तो हार मानने जैसा कोई विकल्प आपके पास नहीं होता है।

अफसोस की बात यह है कि यह उसकी परीक्षा का अंत नहीं था। कीमोथेरेपी के 6 वें सत्र के बाद, उसकी भौहें और पलको के बाल भी गिरने लगे थी। वह स्पष्ट रूप से निराश थी, उसने दर्पण की ओर देखना बंद कर दिया ताकि उसे ऐसा न लगे की वो किसी चट्टान से टकरा रही हो और उससे टकरा कर वह चूर - चूर हो जाएगी। चूँकि ये समय काफी मुश्किल था पर प्रियंका ने इस परिस्थिति से बाहर निकलने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी थी। उसने अपने मुंडन किये हुए सर को रंगीन कपड़े से सुन्दर तरीके से ढका और इसके साथ ही मेकअप और सुन्दर कपडे पहनना शुरू कर दिया ताकि उसका मन अच्छा हो जाए और वह अपने लिए अच्छा मह्सूस करे।  प्रियंका को ऐसे देख कर वहाँ की नर्सो के लिए यह यकीन करना मुश्किल हो गया था की प्रियंका एक मरीज़ है। उसका उत्साह और जज़्बा कहीं से कहीं तक एक कैंसर रोगी जैसा नहीं था।

प्रियंका का मानना था कि - अपना सिर हमेशा सूरज की रौशनी की तरफ रखो, तब परछाईं हमेशा आपके पीछे ही रहेगी!

प्रियंका ने प्रेरक ब्लॉग और आध्यात्मिक पुस्तकें पढ़ना शुरू कर दिया और वह बच्चो के साथ खेलने लगी ताकि वह अपने आप को इस निराशाजनक परिस्थिति से अपना ध्यान हटा सके। इस सब के बीच, उसने जानबूझकर खुद को इंटरनेट पर अपनी बीमारी के बारे में जानने से परहेज किया। उसके डॉक्टर ने उसे इंटरनेट से किसी भी जानकारी से अभिभूत नहीं होने के लिए मना किया था। वैसे भी आधा पका हुआ ज्ञान दुनिया की सबसे खतरनाक चीज है, उसने खुद को वादा किया की वह इंटरनेट अपनी बिमारी के बारे में जानने की अपनी चाहत को अपने ऊपर हावी नहीं होने देगी। इतना ही नहीं, उसने खुद को अत्यधिक चिंता दिखाने वाले लोगों से दूर किया। उसने जानबूझकर खुद को सकारात्मक और उत्साह बढ़ने वाले लोगो से अपने आप को घेर लिया जो उसके और उसके सपने पर विश्वाश रखते थे की वो एक दिन ज़रूर जीतेगी। परीक्षा की इस घड़ी में रोंडा बर्न की प्रेरक पुस्तक "सीक्रेट्स" उसका सच्चा साथी साबित हुआ। "जीवन का महान रहस्य आकर्षण का नियम है या सृष्टि का नियम। सरल शब्दों में, जीवन आपके लिए नहीं हो रहा है, आप इसे बना रहे हैं! निराशाजनक जैसी कोई स्थिति नहीं होती। आपके जीवन की हर एक परिस्थिति बदल सकती है"!

भगवान हमेशा उनकी मदद करते हैं जो खुद की मदद करते हैं। प्रियंका इसका जीता जागता उदाहरण थीं। प्रियंका के आशावादी  होने की वजह से कीमोथेरेपी के सिर्फ 6 सत्रों में उसका ट्यूमर अपने मूल आकार से 50 % तक सिकुड़ गया। भगवान की कृपा, चमत्कार और आस्था से यह सब सच में हो रहा था उसकी बिमारी सच में खत्म हो रही थी। अगले 6 सत्रों के बाद, उसका ट्यूमर अपने मूल आकार से 70% तक कमी आई साथ ही कैंसर सेल की गतिविधि में भी भारी गिरावट देखने को मिली। उसे जल्दी ठीक होने की गति को देखर डॉक्टर्स भी काफी खुश और आश्चर्य चकित थे।

प्रियंका आज जहॉ भी थी वह सिर्फ अपनी सोच की वजह से थी ज़िन्दग़ी के प्रति उसकी सकरात्मक सोच, इसी सकरात्मक सोच की वजह से ही वह ऐसी विषम परिस्थिति से बाहर निकल पाई। 'सीक्रेट' नामक पुस्तक का हर शब्द सच साबित हो रहा था।

प्रियंका बहुत ही प्रफुलित थी और यही चीज़ उसे आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर रही थी, वह अपने आप को रोज़ स्वस्थ आहार और अच्छे विचारो से अपने आप को पोषित करती थी। उसके इलाज का अंतिम चरण रेडिएशन थेरेपी की प्रक्रिया TATA मेमोरियल अस्पताल में की गई। यह थेरेपी  डॉ सिद्धार्थ लस्कर जो की हड्डी और कोमल ऊतकों की विकिरण चिकित्सा के विशेषज्ञ है उनके सक्षम और अनुभवी हाथो द्वारा हुआ, प्रियंका को विकिरण चिकित्सा के 28 चक्रों से गुजरना पड़ा।

प्रियंका के लिए TATA मेमोरियल सेंटर का दौरा करना एक संपूर्ण जीवन बदलने वाला अनुभव था। उसे वहाँ के कैंसर ग्रसित लोगो को देखर बहुत आघात पहुंचा जिन्होंने कैंसर की वजह से अपना कोई न कोई  अंग जैसे मुँह, आँख खो दिया था। उसे महसूस हुआ की उसका ये दर्द तो उस दर्द के आगे कुछ भी नहीं है जो छोटे बच्चो को इस घातक बिमारी की वजह से हो रहा है वो भी इतनी कम उम्र में । मासूम बच्चों  के हाथों में आई वी ड्रिप और उसका दर्द देख कर उसकी आत्मा अंदर तक रो दी। इन लोगों के सिर पर छत नहीं थी, निजी तौर पर हॉस्पिटल का खर्च वहन करने के लिए पैसे भी नहीं थे  वे अपने भाग्य के भरोसे थे। यह सब देख कर प्रियंका ने उसी समय , भगवान को 25 वर्षों तक स्वस्थ जीवन जीने देने के लिए धन्यवाद किया। उसने भगवान का शुक्रियादा किया की वह कितनी धन्य है की उसे ऐसी समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ा जो वह दूसरे लोगों को करना पड़ रहा है।




उसकी विकिरण चिकित्सा के तुरंत बाद, उसके शरीर की सभी कैंसर कोशिकाएं मृत हो गईं। उसे कैंसर-मुक्त घोषित किया गया था। प्रियंका खुश थी, उसके दर्द के दिन खत्म हो गए थे। वह अपने जीवन के नए चरण का आनंद ले रही थी तभी डॉक्टरों ने एक बार फिर दिल को झकझोर देने वाली खबर दी।  हालांकि वह जानलेवा बीमारी से मुक्त थी पर उसका ट्यूमर पूरी तरह से गायब नहीं हुआ था। प्रियंका को हार्ट ट्रांसप्लांट कराना पड़ेगा यह खबर सुन कर प्रियंका के परिवार को झटका लगा पर उन्होंने दूसरी राय लेना का फैसला किया। इस बार प्रियंका की किस्मत ने उसका साथ दिया। वे मुलुंड फोर्टिस अस्पताल के डॉक्टर अन्वय मुले से मिले जिन्होंने हृदय प्रत्यारोपण न करने का फैसला किया। उन्होंने सुझाव दिया कि प्रियंका के मामले में एक नियमित कार्डिक सर्जरी की ज़रूरत है और यही उसके लिए सही होगा।

किसी भी सर्जिकल प्रक्रिया से पहले एक प्रोटोकॉल के रूप में, एक प्री अनेस्थेटिक चेकअप (पीएसी) से गुजरना पड़ता है। यह सर्जरी के आगे बढ़ने की एक प्रक्रिया थी । सर्जरी से कुछ दिन पहले प्रियंका के लिए, पीएसी के एक हिस्से के रूप में एक 2 डी इको किया गया था। प्रियंका का हौसला बढ़ाने के लिए, डॉक्टरों ने उसे 2 डी इको दिखाया कि उसका ट्यूमर काफी सिकुड़ गया था और वह अब पूरी तरह से स्वस्थ थी। डॉक्टरों ने उसे बताया कि अब सर्जरी की आवश्यकता नहीं है  और एक फिटनेस प्रमाण पत्र दिया। वह अब जीवन को नए सिरे से शुरू करने के लिए तैयार थी। डॉक्टरों ने सलाह दी कि उसे हर साल एमआरआई स्क्रीनिंग और 2-डी इको की आवश्यकता होगी ताकि  किसी भी तरह से बीमारी के वापस आने की गुंजाईश न रह जाये।

प्रियंका को विश्वास नहीं हो रहा था की ये सब सच में हो रहा है उसे अपने किस्मत पे यकीन नहीं हो रहा था। उसने आँखे बंद कर भगवान को मन ही मन याद किया और उन्हें धन्यवाद किया। भगवान की कृपा रही की 2 साल के संघर्ष और दर्द के बाद वह विजयी होकर अपनी लड़ाई से बाहर आई थी। और यह जीत सिर्फ उसकी जीत नहीं थी उसके परिवार और उन दोस्तों की भी थी जो इस दौरान उसके साथ हमेशा इस लड़ाई में उसके साथ खड़े रहे।

उसके माता-पिता और भाई उसकी ताकत थे जो स्तंभ की तरह उसके साथ खड़े थे। प्रियंका की माँ ने उसे लगातार बदलते मिजाज के प्रकोप से उबारा| वह धैर्य के साथ सब सहन करती गई उसे कम मसाले, ताजे फल और पर्याप्त पानी के साथ स्वस्थ भोजन प्रदान करके देखभाल करती गईं।

उसकी विकिरण चिकित्सा के बाद, प्रियंका के माता-पिता उसे शहर की प्रदूषित हवा दूर रखने के लिए अपने गाँव ले गए। वे चाहते थे कि उसकी कमजोर प्रणाली शुद्ध वातावरण में अच्छी तरह से ठीक हो जाए और उसे तुलसी का काढ़ा और आयुर्वेदिक दवाएं दी गईं ताकि उसके शरीर प्रतिरोधक क्षमता पुनः निर्माण हो सके।

यह भूलने वाली बात नहीं है की कैंसर का पता लगने के बाद के उसके शुरुआती दिन बहुत दुःखद थे; उसने भगवान से सवाल किया- ये सब मेरे साथ ही क्यों? उसके आगे उसका पूरा जीवन था, उसके सपने अधूरे थे; उसने यह जानने की कोशिश की कि भगवान उसके साथ ऐसा क्यों कर रहा है और वह इतना  निर्दयी कैसे हो सकता है। उसका दिमाग उसके साथ लगातार लड़ाई में था, इतना कि वह सोने से डरने लगी थी। उसे यह डर था की कहीं ऐसा न हो की वो रात को सोये और वह अगली सुबह ही न देख पाए।

उसे ऐसे हाल में देखना उसके चाहने वालो के लिए बहुत ही मुश्किल था। इस समय, उसकी बहिन ने उसे इस मानसिक यातना से बाहर निकालने का ज़िम्मा लिया। उन्होंने उसे ध्यान के माध्यम से उपचार की शक्ति से परिचित कराया। प्रियंका की बहिन ने उसके साथ प्रेरणा सत्र लिया जो किसी रोग को मिटाने के लिए सकरात्मक मानसिकता और इच्छाशक्ति के आधार पर केंद्रित था।

प्रियका के अपने शब्दों में - आपके जीवन में ऐसे लोगों का होना एक आशीर्वाद है। मैं उन सभी लोगों का मेरे साथ होने के लिए उन्हें धन्यवाद देती हूं। और हाँ , आप अपने पहले प्रेरक हैं। यदि आपके पास इच्छाशक्ति है, तो चाहे कुछ भी हो जाए ब्रह्मांड की सभी शक्तियाँ आपका समर्थन करेंगी।

आज, प्रियंका भविष्य के बारे में बहुत अधिक चिंता किए बिना, एक स्वस्थ और सुखी जीवन जी रही है। प्रियंका कहती हैं की - इस क्षण पर आपको ध्यान देना चाहिए,  इसी के लिए आपको जीना चाहिए! आनंद लो, मौज करो, छोटी-छोटी बातों में सुख तलाश करो क्योंकि यह जीवन अनमोल है इसे व्यर्थ पर बर्बाद ना होने दे। प्रियंका तावरे की कहानी वह कहानी है जो सपने देखते हैं। यह उसके और उसके अपनों के जीत और उत्साह की कहानी है। प्रियंका तावरे का मामला एक प्रेरणा के रूप में, फोर्टिस के डॉक्टरों द्वारा अमेरिका भेजा गया था। उसकी फाइल मुंबई के टाटा मेमोरियल सेंटर में भी केस-स्टडी के लिए रखा गया है।

प्रियंका तुम्हें सलाम ! Storyforyou.in आपके स्वस्थ जीवन की कामना करता है!

 

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हिंदी रूपांतरण: स्मृति सिंह (www.storyforyou.in/smritisingh)

लेखिका: शानू पांडे (www.storyforyou.in/shanupande)

Shanu Pande

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