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“हरषे नयन छवि बलिहारी, राम लखन मिथिलेश कुमारी“

श्री गूदर बादशाह के मंदिर की कहानी किसी चमत्कार से जुडी नहीं है। ब्रिटिश शासन में खादी वस्त्र धारण कर, क्रांति का इतिहास रचा था गूदर बादशाह ने। अयोध्या में जन्मे राम लला के वैसे तो कई सारे मन्दिर पूरे देश में प्रसिध्द है जहाँ मर्यादा पुरोष्तम श्री राम, माता सिया और भैया लखन के साथ सुशोभित रूप से विराजमान हैं और ये मन्दिर एवं इनका अभूतपूर्व इतिहास दोनों ही अदभुत हैं।




आइए चलते हैं, बुन्देलखण्ड की मधुपुरी, जिसमें सुखनई नदी के पावन घाट पर राम जी और श्याम जी विधमान हैं। झाँसी जिले के मऊरानीपुर नगर (तहसील) को छोटी अयोध्या की भी उपधि प्राप्त है। इस नगर में लगभग २०० से अधिक मंदिरों की प्राण प्रतिष्ठा है।

लगभग 400 वर्षों पुराना है यहाँ के, श्री गूदर बादशाह महाराज मंदिर और उनमें विराजे दशरथ नंदन की प्रतिमाओं का इतिहास। ज्ञानकारो के विचारों और कुछ तथ्यों से पता चलता है कि जिस समय ओरंगर्जेब ने अपनी क्रूरता और बर्बरता उत्तर भारत के मंदिरों में दिखाई थी और छिन्न-भिन्न कर दिया था सनातन काल की उन सभी निशानियों (प्रतिमाओं) को जो अपने आप में सत्य का प्रत्यक्ष प्रमाण थी। उसी काल में कई मूर्तियों को भूमिगत कर दिया गया था। कहा जाता है कि गुदडी वाले बाबा के स्वप्न में आकर श्री रघुकुल नंदन ने अपने होने की बात कही थी और बताया था कि अमुख स्थान पर प्रतिमाएं उपस्थित हैं। उसी समय से “गुदडी बाले बाबा” की परम सेवा में सियाराम और लखन जी की विधिवत पूजा आरंभ हुई और बाबा बन गए प्रभु के अभिन्न सेवक।

“गुदडी के लाल से, रघुबर के पाल तक,
बाबा हुए प्रसिद, हर नदी ताल तक ।
भक्त के प्रेम में प्रभु, डूबे बने गूदर बाबा,
गूंजेगा नभ में नाम, सदा चिर काल तक ।

बस तभी से ये पावन स्थान "गूदर बाबा" के नाम से प्रसिद्ध हुआ । उसके बाद प्रभु की पूजा-अर्चना इसी प्रकार होती रही । भगवान का सिंगार और विहार दोनों ही चलते रहे।




मऊरानीपुर नगर में लगभग 134 सालों से अब तक हर वर्ष नगर पालिका के सहयोग से “मऊरानीपुर जल-विहार मेला"आयोजित किया जाता है। जिसमें शहर के व आसपास के सभी मंदिरों से भगवान भाद्रपद शुक्ल द्वादशी में सुखनई नदी जो छोटी अयोध्या की सरयू है वहाँ विहार के लिए जाते है और दूसरे दिन प्रातः पूरे नगर का भ्रमण कर वापस आते हैं। इसके साथ ही नगर में भव्य आयोजन किया जाता है।

आजादी के कुछ वर्ष पहले (सन १९४२ या १९४३) अंग्रेज शासन के समय, हर वर्ष की भांति सभी मंदिरों के भगवान का विहार सुखनई नदी के किनारे होना था । उस वर्ष अंग्रेजों ने इस उत्सव एवं भगवान के विहार पर पाबंदी लगा दी। नगरवासियों को इससे नाराजगी तो हुई लेकिन अंग्रेजों के खिलाफ जाने की हिम्मत किसी में भी नहीं थी।

उस समय गूदर बाबा मंदिर के महंत श्री लाल दास जी महाराज हुआ करते थे। जब उन तक यह बात पहुंची तो उन्हें यह बात रास नहीं आई और उन्होंने इसका विरोध करने की ठान ली। उन्होंने नगर के संतो और कुछ नगरवासियों को इकठ्ठा किया और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लड़ने के लिए उनमें हिम्मत जगाई।

बाबा लाल दास जी ने गूदर बाबा मंदिर का विमान निकाला और विहार के लिए सुखनई नदी के घाट पर पहुंचे। जैसे ही अंग्रेजों को इस बात की खबर लगी, उन्होंने विमान रुकबा दिया। फिर तुरंत ही बाबा लाल दास समेत कुछ और लोगों को बंदी बना लिया तथा भगवान गूदर बाबा (सियाराम और लखन जी) को पुलिस चौकी के प्रान्गड़ में बिठा दिया।




परन्तु परमात्मा को कैIन बन्दी बना पाया है। राजा को कोई विपदा आए और प्रजा आगे ना आए ऐसा कब हुआ है? जब खबर नगर में फैली और पता चला कि भगवान् को बंदी बनाया गया है तो मऊरानीपुर के जनमानस को यह बात असहनीय हो गयी। नगर के लोगों ने वहां पहुंचकर पुलिस चौकी को घेर लिया और उनकी रिहाई की मांग करने लगे। जनता के सैलाब को साथ देख वहां तैनात अंग्रेज अफसर डर गया और उसकी बुद्धि क्षीण होते दिखी। उसने तुरंत ही बड़े अधिकारीयों से बात कर लाल दास जी महाराज को छोड़ने का फैसला किया।

एसा भी कहा जाता है कि जब लाल दास जी महाराज बंदी थे तभी एकाएक कई वानरों ने परिसर पर धावा बोल दिया और चौकी के परिसर में बहुत उत्पात मचाया। अंग्रेज जो चौकी पर तैनात थे इतने वानरों को देख कर कॉप रहें थे। और इसके चलते उन्होंने लाल दास जी महाराज को मुक्त करने में ही अपनी सलामती समझी।




बाबा की रिहाई के साथ-साथ बिना देर किये अंग्रेजों ने प्रभु के विहार को अतिशीघ्र संपन्न कराने का फरमान जारी किया। इसके पश्चात पुलिस चौकी के प्रांगण में ही प्रभु की आरती हुई और फिर खादी की पोशाक में जयघोष के साथ भगवान् का विहार कराया गया। अंग्रेजों ने गूदर बाबा का पहला तिलक चाँदी के गजाशाही सिक्के से किया।

गूदर बाबा महाराज ने क्रांतिकारी तरीके से वर्षों से चली आ रही मऊरानीपुर जल विहार की अद्भुद परम्परा को टूटने से बचा लिया। उसी समय से मऊरानीपुर वासियों ने "गूदर बाबा" को कहा "गूदर बादशाह", जिनके सामने ब्रिटिश साम्राज्य ने भी सलामी दी। तब से ही गूदर बादशाह महारज का विमान सर्वप्रथम निकालकर उनका विहार कराया जाता है। मऊरानीपुर जलविहार महोत्सव की इस अतिविशाल विमान यात्रा का पिछले ७७ वर्षों से नेत्रत्व करते आ रहें है “महाराज गूदर बादशाह”।

"सर्वप्रथम है गूदर राजा, सिया, राम, लखन संग साजा ।
इनके दुर्लब दर्शन पाके, सकल मनोरथ, पूरन काजा ।।"

“जय जय हो श्री  गूदर बादशाह महाराज की”

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Manshi 'Sundar'

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