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आयो हो दोर विनती है मोर दुनियाँ में शोर माँ दिबनारी
मम चित चकोर चरनन में तोर कर कृपा कोर महियर वारी।।

तेरे भुज हैं अष्ठ मैटत हैं कष्ट कर नष्ट अम्ब विपदा मोरी
पालत है सृष्ट कर कृपा दृष्टि मोरी है इष्ट मूरत तोरी
विद्या अभाव मेरो मिटाव ऐसौ प्रभाव दे माँ मौरी
भक्ती कौ भाव उर में जगाव कविता लिखाव माँ रस बोरी

पद कमल धूर मोकों है मूर शोभा सिंदूर की सुखकारी
मम चित चकोर चरनन में तोर कर कृपा कोर महियर वारी।।

मोसौ अनाथ कर दै सनाथ धर कृपा हाथ माँ वर वारौ
पाँऊ सुपाथ मैया के साथ चरनन में माथ सुत गबुअरौ
ईसन की ईश तेरी आशीष अवनीय करत है मगनारौ
कहते धर घर धरा शीश गाते मनीष यह जंस आरौ

तू उमा रूप तूँ रमा रूप तेरे क्षमा रूप की बलिहारी
मम चित चकोर चरनन में तोर कर कृपा कोर महियर वारी।।

लोकन में लोक यह मृत्यु लोक अवलोक अम्ब है दुख मारौ
ऐसौ विलोक दे मिटा शोक होवै अशोक माँ सुखयारौ
सूरज में वास तेरौ प्रकाश नीले आकाश में उजयारौ
आयो जै आस मैया के पास चातक सी प्यास अमृत डारौ

हे जगत अम्ब ना कर विलम्ब अवलम्ब देव मोय हितकारी
मम चित चकोर चरवन में तोर कर कृपा कोर महियर वारी।।

मन्दिर में आन जो धरे ज्ञान देवी दै ज्ञान तूँ कल्यानी
शानों में शान गुरू व्यास जान जिनका निषान है  वरदानी
कवि जैत तुच्छ दे बना उच्च केहर की मुच्छ ज्यों लासानी
बैरन के गुच्छ पर जाँय पुच्च हम दैय पुच्च लै धनु पानी

ख्यालों में ख्याल माँ का विशाल हो जा दयाल खप्पर वारी
मम चित चकोर चरनन में तोर कर कृपा कोर महियर वारी।।

 




स्व. प. जैतराम धमैनिया
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