Loading




मै कोरा अभिनंदन पत्र हो गया,
हादसा विचित्र हो गया|

लिखा मेरे सीने पर, लेखनी ने स्याही से ,
पर बाचक प्रशिद्ध, जन प्रिय मित्र हो गया है|

ताड़ बना तिल को ,अतिरंजित गुण गान किये,
पशीना, श्रीमान का इत्र हो गया|

उठाये बोझ वर्षों से कील तो उपेझित हुई
प्रसिद्धि का सुपात्र बस चित्र हो गया|

"चोबे" गीत गैरों के, गाये अपने नाम से,
मिथ्या यश, मन चंदन, पवित्र हो गया|




Latest posts by श्री हृदयनाथ चतुर्वेदी (see all)

Facebook Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Top
error: Content is protected !!
%d bloggers like this: